veer savarkar swatantra veer savarkar in hindi । वीर सावरकर की जीवनी भाग1

Veer Savarkar Swatantra Veer Savarkar स्वातंत्र्य वीर विनायक सावरकर Veer Savarkar वीर सावरकर जी के बारे में अनेकों झूठी भ्रांतियां अनेकों प्रकार के प्रॉप गंडे देशद्रोहियों के द्वारा फैलाए जाते रहे।

इस लेख के माध्यम से उनके मुंह पर करारा तमाचा लगेगा। काफी सारे युवक तो ऐसे हैं जिन्हें देश भक्ति का क, ख, भी नहीं आता कभी 2 दिन उपवास कर भी नहीं सकते ऐसे ऐसे युवक भी Veer Savarkar के ऊपर उंगलियां उठाते हैं। थू है तुम्हारी सोच पर देश द्रोही युवको।

तुम देश द्रोही युवक और वो युतियाँ जो भारत के क्रांतिकारियों पर ऊँगली उठाने की हिम्मत करते है वो जानते भी नही है की Veer Savarkar जैसे क्रांतिकारियों ने और इनके परिवारों ने कितना त्याग किया है। और वो समय भी आयेगा जब हम कट्टर देश भक्त तुम देश द्रोही युवक युवतियों की वो ऊँगली जड़ से उउखाड़ देंगे जो तुमने हमारे वीर क्रांतिकारियों पर उठाई है ।

जो जो Veer Savarkar के ऊपर उंगली उठाता है या फिर और दूसरे क्रांतिकारियों के ऊपर उंगली उठाता है उनको एक बार क्रांतिकारियों का जीवन त्याग पूर्ण जीवन जी कर देखना चाहिए तब उन्हें समझ में आएगा कि एक क्रांतिकारी क्या होता था।

वैसे सच कहूं तो इस भारतवर्ष में किसी क्रांतिकारी को पैदा ही नहीं होना चाहिए था क्रांतिकारि जो जीवित रहे आजादी के बाद में उनके साथ में क्या-क्या हुआ उनको इतनी बुरी तरीके से जीवन जीना पड़ा जिसके बारे में मैं कल्पना भी नहीं कर सकता।

आज कुछ दो कौड़ी के व्यक्ति क्रांतिकारियों पर उंगली उठाते हैं Veer Savarkar पर उंगली उठाते हैं आज यह लेख जो आप पढ़ रहे हैं उनके मुंह पर कड़ा तमाचा लगेगा इस लेख को पढ़ने के बाद में।

नोट :- मित्रो इस लेख के कई भाग आएँगे अभी ये भाग एक है क्योंकि एक ही लेख में Veer Savarkar जी का पूरा जीवन देना सम्भव नही है यदि एसा किया तो लेख बहुत ही बडा हो जायेगा मे जल्दी जल्दी सारे लेख डाल दूंगा ।

Veer Savarkar वीर सावरकर की जीवनी

Veer Savarkar वीर सावरकर की जीवनी
जन्म 28 मई 1883 ग्राम भागुर, जिला नासिक बंबई प्रेसीडेंसी भारत
पिता का नाम दामोदर पन्त सावरकर
भाई बहन गणेश पनत बाला सावरकर , विनायक सावरकर , मैता बाई , नारायणराव सावरकर
शिक्षा कला स्नातक, फर्ग्युसन कॉलिज, पुणे बार एट ला लन्दन
जीवनसाथी यमुनाबाई
बच्चेपुत्री: प्रभात चिपलूणकर

पुत्र: प्रभाकर (अल्पायु में मृत्यु)
एवं विश्वास सावरकर,
राष्ट्रीयता भारतीय
मृत्यु 26 फ़रवरी , 1966 (उम्र 82) बम्बई, भारत
प्रसिद्ध पुस्तक मोपला अर्थात मुझे इससे क्या
veer savarkar swatantra veer savarkar in hindi । वीर सावरकर की जीवनी
तस्वीर विकिपीडिया से ली गई है

महाराष्ट्र में नासिक जिले के भगुर ग्राम में एक चितपावन ब्राह्मण ग्रहस्थ दामोदर पन्त सावरकर रहते थे उनके चार संतान थी प्रथम गणेश पनत वा बाला सावरकर, द्वितीय विनायक सावरकर, तृतीय कन्या मैता बाई और चतुर्थ नारायणराव सावरकर थे।

गणेश पंत Veer Savarkar से 4 वर्ष बड़े और डॉक्टर नारायण उनसे 5 वर्ष छोटे थे। विनायक का जन्म 1883 ईस्वी में हुआ था। यही वह दिव्य बालक था जो आगे चलकर “क्रांतिकारियों का राजकुमार” बना जिसे विदेशी लोगों ने भी हुतात्मा की पदवी दी और जिसे यूरोपीय राजनीतिज्ञों ने मेजनी गेरी वाल्डी क्रोपाट किनू बुलफ्टोंन ओर एमटे कह कर उसकी खूब प्रशंसा की।

और जिसे हिंदुओं ने हिंदू राष्ट्रपति छत्रपति शिवा के रूप में मान्यता दी। आगे चलकर यह तीन भाई सावरकर बंधु नाम से विख्यात हुए। और महाराष्ट्र और इंग्लैंड में क्रांतिकारियों के बड़े नेता श्री विनायक सावरकर के होने के कारण वह काल सावरकर युग ही कहलाया।

सावरकर के पिता दामोदर पंत सावरकर अच्छे विद्वान ही नहीं किंतु साथ ही बहुत अच्छे कवि भी थे। वे अपनी संतान में उच्च भावनाएं भरने के लिए रामायण, महाभारत, की शिक्षाप्रद कथाएं शिवाजी, महाराणा प्रताप, भाऊ बाजीराव प्रथम आदि देशभक्त वीरों के जीवन तथा गीत सुनाया करते थे।

वे अपनी संतान में काव्य रस से प्रेम उत्पन्न करने के लिए महाराष्ट्र के प्रसिद्ध कवि वामन मोरोपंत और संत तुकाराम की कविताएं सुनाया करते थे। इसी कारण विनायक की बुद्धि का विकास बाल्यकाल में ही हो गया था।

वह 8 वर्ष की आयु में ही कविता करने लगे थे जब इनकी आयु 10 वर्ष की थी तभी इनकी बनाई हुई कविताएं मराठी के प्रसिद्ध पत्र जगद्वीतेछु आदि में बड़ी उत्सुकता से छापी जाती थी। 

किंतु संपादक महोदय को यह ज्ञात नहीं था कि इन कविताओं का रचयिता 10 12 वर्ष की आयु का बालक है। विनायक को छत्रपति शिवाजी के चरित्र से अत्यंत प्रेम था। यह केसरी आदि पत्रिकाएं महाभारत तथा अन्य मराठा वीरों की विजय यात्राओं को बड़ी श्रद्धा से पढ़ते थे और अपने साथियों को भी पढ़ने की प्रेरणा करते थे।

उनके आमोद प्रमोद ने भी महाराष्ट्र और राजस्थान के वीरों की कथाओं का रूप धारण कर लिया था। वह अल्पायु में ही अपने मित्रों में विद्वान देशभक्त और ओजस्वी वक्ता के रूप में पूज्य भाव में देखे जाते थे। सन 1893 से लेकर 1895 तक सारे भारतवर्ष में धर्मांधता के कारण हिंदू मुस्लिम झगड़े हुए। महाराष्ट्र भी इनसे कैसे बच सकता था।

पुणे आदि नगरों में भी यह अग्नि भड़की । उस समय मुसलमानों के अत्याचार का बदला लेने के लिए इस वीर बालक विनायक ने अपने ग्राम भगुर में अपनी बाल टोली को लेकर ग्राम से बाहर एक मस्जिद पर चढ़ाई कर दी। शत्रु कोई सम्मुख ना आया, थोड़ी सी देर में ही इन 12 मराठा बालकों ने जिनकी आयु 15 वर्ष से अधिक ना थी। मस्जिद के मीनार की भित्तियां तोड़फोड़ कर उसे भूमिसात कर दिया और अपना कार्य करके अपने इस नेता की आज्ञा से बालक चलते बने।

स्कूल में मुसलमान लड़कों से इनकी टोली का कई बार झगड़ा हुआ टोली वीरता से लड़ती थी और विजय इनके पक्ष की होती थी। एक मुसलमान अरब लड़के ने विनायक के मुख में मछली का मांस डालकर इन्हें बलपूर्वक मुसलमान बनाने की धमकी दी। किंतु वीर विनायक इन थोती धमकियों से कहां डरने वाले थे इन्होंने अपने सैनिकों को सैनिक शिक्षा देने के लिए सैनिक शाला खोली और इनमें भावना भरने लगे। अनुशासन और सैनिक शिक्षणआर्थ परस्पर नकली युद्ध की रचना रच कर अभ्यास कराते थे। 

इसी प्रकार उन्हें महाराष्ट्र के ऐतिहासिक दुर्ग में ले जाकर अपने प्राचीन वीर पुरुषों की वीर भावनाएं भरते थे कभी अपने साथियों को सिंह गढ़ के दुर्ग में ले जाकर वहां विजय सेनापति तानाजी मालुसरे की वीरता की कथा सुनाकर ईश्वर से प्रार्थना करते थे कि हम में भी ऐसी शक्ति का संचार हो कि जिससे हम अपनी जाति और देश को स्वतंत्र करने के लिए अपना कर्तव्य पालन करें।

इसी प्रकार वे साथियों को राष्ट्र सेवार्थ तैयार करते थे अपने पिताजी के साथ वे पूजा वंदना में भी पर्याप्त समय देते थे वे घंटों देव पूजा में लगा देते और सदैव देश जाति को दुखों से छुड़ाने की प्रार्थना करते थे। जब यह 10 वर्ष के ही थे इनकी माता का देहांत हो गया फिर पालन पोषण का भार पिताजी पर ही पड़ गया इनके पिताजी ने माता के समान ही अपनी संतान का पालन पोषण किया इनके पिता जी इनकी शिक्षा का भी बड़ा ध्यान रखते थे।

वीर दामोदर सावरकर की शिक्षा

विनायक सावरकर ने राजनीतिक कार्य करते हुए भी अपने अध्ययन की कभी उपेक्षा नहीं की और ना अपने साथियों को करने दी। वे कभी भी किसी परीक्षा में अनुत्तीर्ण नहीं हुए। 1901 में उन्होंने अधिकारी परीक्षा उत्तीर्ण कर पुणे में पहुंच फाग्युर्सन कॉलेज में प्रवेश किया। उससे जाते समय इनके मित्रों और प्रतिष्ठित लोगों ने विनायक को बड़े समारोह से विदा किया।

स्कूल कॉलेज में पढ़ते समय उन्होंने अपना राजनीतिक कार्य भी खूब उत्साह से किया चारों वर्ष कॉलेज में देशभक्ति और राष्ट्रीयता के अपने सिद्धांतों का खूब प्रचार करते रहे पढ़ते समय भी इनकी इतिहास में स्वाभाविक रूचि थी संसार की सभी क्रांतियों का इतिहास इन्होंने अपने विद्यार्थी जीवन में ही पढ़ लिया था।

इनको पढ़ने में इतनी रुचि थी कि इनके सहपाठी इन्हें “किताबी कीड़ा” कहा करते थे वह और उनके साथी अपने कार्य में तत्पर रहते थे वह सब एक समान वस्त्र धारण करते थे। सरलता का जीवन बिताते कठोर परिश्रम अध्ययनार्थ करते , नियम पूर्वक सब परीक्षाओं में उत्तीर्ण होते थे।

शारीरिक व्यायाम करते थे विद्यार्थी जीवन में इनकी राजनीतिक हलचलें भी इतिहास की अमर कथाएं हैं।

विद्यार्थी जीवन में राजनीतिक संगठन

समाचार पत्रों और राजनीतिक ग्रंथों के स्वाध्याय से वीर विनायक अपनी राजनीति के ज्ञान और योग्यता का संपादन अपने स्कूल के अध्ययन के साथ-साथ कर रहे थे उस समय विदेशी वस्त्र बहिष्कार की अनेक कविताएं भी समाचार पत्रों में छपी थी। 1 दिन समाचार पत्रों में उन्होंने पढ़ा कि चाफेकर बंधुओं ने अत्याचारी अंग्रेज रेंड प्लेस कमिश्नर और उसके एक साथी गोरे को गोली से समाप्त कर दिया।

तीनों चाफेकर बंधुओं और उनके साथियों को फांसी का दंड दिया लोकमान्य तिलक को जेल भेज दिया, नातुबनधू, निर्वासित हुए। विनायक के बाल हृदय पर इस घटना का बहुत प्रभाव पड़ा उन्होंने आंसू भरी आंखों से फांसी आदि के दुखद समाचार पढ़ें veer savarkar आप ही आप बोलने लगे।

“चाफेकर उठती जवानी में चले गए, उन्होंने अपनी मातृ भूमि के लिए सब कुछ न्योछावर कर दिया तो क्या मुझे खा पीकर मौज उड़ाना ही शोभा देता है? उनका कार्य अधूरा पड़ा है, उनकी इच्छाएं अपूर्ण खड़ी है। क्यों ना मैं प्रतिज्ञा करूं कि उनके कार्य को पूरा करने में अपने प्राण तक दे डालूं मैं उसे पूर्ण करूंगा अन्यथा उसके पर्यतन में जीवन दे डालूंगा।”

तत्पश्चात वे दुर्गा के सम्मुख उपस्थित होकर शिवा की भांति अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए प्रार्थना कर शक्ति मांगने लगे और फिर शांत खड़े होकर उन्होंने प्रतिज्ञा की “मैं भारत माता की बेड़ियां तोड़ने के लिए अपना जीवन अर्पण करूंगा, मैं गुप्त संस्थाएं खोलूंगा, शस्त्र बनाऊंगा और समय आने पर हाथ में शस्त्र लेकर स्वतंत्रता के लिए लड़ता लड़ता मरूंगा”।

इसी बालक ने युवा बनकर अपनी प्रतिज्ञा पूर्ति के लिए अपना सारा जीवन कंटकाकिर्ण बना लिया। उसी दिन से यह अपने कार्य में जुट गया उसी दिन अपने साथियों को चाफेकर बंधुओं की स्तुति में एक गीत बनाकर भाव भरने के लिए सुनाया गीत बड़ा ही सुंदर था सब पर अच्छा प्रभाव पड़ा। आपने ‘अभिनव भारत’ नाम की संस्था की स्थापना करके अपनी विचारधारा का प्रचार करना आरंभ किया।

किंतु इन्हीं दिनों प्लेग इतने जोर से फैला कि सैकड़ों व्यक्ति इसकी झड़प में आ गए। विनायक के पिताजी का देहांत भी प्लेग से हो गया। पुलिस वालों ने आकर इन को घर से निकाल दिया छोटा भाई 9 या 10 वर्ष का था, उस पर भी प्लेग्ने आक्रमण किया इनका सारा परिवार जंगल में चला गया फिर वे एक मित्र की सहायता से नासिक आए। 


वहां बड़े भाई बाबा सावरकर को भी प्लेग ने दबा लिया विनायक तथा उनकी भाभी ने दो भाइयों की इस अवस्था में खूब परिचर्या की। ईश कृपा से शीघ्र दोनों भाई स्वस्थ हो गए। इन्होंने वहां भी अपने साथी ढूंढ निकाले और मित्र मेला नाम से एक संस्था बनाई यह इनका क्रांतिकारी संगठन था इसके द्वारा खूब कार्य किया इस संस्था का उद्देश्य सशस्त्र क्रांति द्वारा स्वतंत्रता प्राप्त करना था।

यह संस्था अपना कार्य गुप्त तथा प्रकट रूप में दोनों प्रकार से करती थी इसके अतिरिक्त नासिक की सभी प्रकट संस्थाएं विनायक जी की अधीनता में कार्य करती थी। वह इन दिनों विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार आंदोलन के संचालन का कार्य करते थे। इस 16, 17 वर्ष की आयु में 1 दिन में तीन तीन सभाओं में भाषण देने पड़ते थे। 

1901 में इनकी संस्था सारे भारत में फैल गई थी। शिवाजी जयंती और गणपति उत्सव इन्हीं की अध्यक्षता में मनाए जाते थे प्रति सप्ताह इनकी सभा के अधिवेशन होते थे। उनमें देशभक्तों के जीवन की कथाएं तथा राजनीतिक विषयों पर भाषण होते थे veer savarkar की ये सभा उनके ही शब्दों में राष्ट्रीय शिक्षालय था। यह इनकी संस्था चौथाई शताब्दी तक चली। इस संस्था ने देश के युवकों को देश भक्ति की शिक्षा देकर भारत माता की मुक्ति के लिए हंसते-हंसते मरना सिखाया था।

सन 1901 में कॉलेज में प्रविष्ट हो वहां कालिज के विद्यार्थियों को देश सेवा की शिक्षा देनी प्रारंभ की भोजन शाला में यह एक हस्तलिखित साप्ताहिक पत्र भी निकालते थे इसमें छपे लेख पूना के प्रसिद्ध पत्रों में और महाराष्ट्र भर में बड़ी रुचि से पढ़े जाते थे यह उन दिनों खुले रूप में स्वतंत्रता। और क्रांति का प्रचार करते थे।

“इटालियन क्रांति” और “क्रांति की सात सीढ़ियां” veer savarkar के ये दो व्याख्यान जिन्होंने सुने थे वे आज भी श्रद्धा से समरण करते हैं। वीर सावरकर का पूना में सार्वजनिक कार्यों में पूर्ण हाथ रहता था। 1905 से 1909 ईस्वी मैं स्वदेशी आंदोलन का जोर हुआ। वीर सावरकर भी पूर्ण शक्ति से जुट गए इन्होंने पूना, नासिख,  तथा महाराष्ट्र के अन्य स्थानों पर स्वदेशी प्रचार के ओजस्वी भाषण दिए।

ग्रीष्मावकाश मैं यह घूम-घूम कर तीन तीन या चार चार भाषण देते हुए घूमने लगे । उनके भाषणों को सुनकर जनता मंत्रमुग्ध हो जाती थी वीर सावरकर ने विदेशी वस्त्रों की होली मनाने के लिए पुणे की जनता को व्याख्यान देकर तैयार कर लिया। पुणे के एक बड़े मैदान में कीमती विदेशी वस्त्रों का ढेर लग गया और उसमें आग लगाकर भारत में विदेशी वस्त्रों की सर्वप्रथम होली मनाई गई।

इस समय वीर सावरकर ने भाषण में कहा “विदेशी वस्त्रों को जला दो और बड़े प्रेम के साथ जला दो और उसी प्रेम के साथ जला दो, जो प्रेम आप इनके साथ सुंदरता आदि के कारण रखते हो। इन्हें जला दो और अधिकार के साथ जला दो।

इसी पवित्र अग्नि को साक्षी देकर आप और अभी स्वदेशी का व्रत धारण करो इस अग्नि के द्वारा उत्पन्न सब देश भावना को आज बुराइयों में नहीं गिना जा सकता यह विदेशी वस्त्र नहीं बल्कि विदेशियों को ही हम जला रहे हैं और उसके साथ ही साथ विदेशियों से मिलकर उत्पन्न हुई राजद्रोही भावना की भी आज हम सदा के लिए अंत्येष्टि कर रहे हैं।

उसी दिन तिलक और परांजय ने भी जोशीले भाषण दिए । इस होली ने भारतीय पत्रों में हलं-चल मचा दी । एक मास तक संमाचार-पत्रों में इसं होली पर टीका-टिप्पणियां होती रहीं । इसको पढ़कर कालिज के अधिकारी भयभीत हो गए और उन्होंने आन्दोलन के उग्र नेता सावरकर को दस रुपये का दण्ड देकर चौबीस घंण्टे में कालिज छोड़ने की आज्ञा दी।

स्वदेशी आन्दोलन में भाग लेने कें कारण सरकारी सहायता प्राप्त भारतीय संस्था से निकाले गये विद्यार्थियों में हमारे वीर॑ विनायंक संवप्रथम विद्यार्थी थे। महाराष्ट्र के सभी राष्ट्रीय-पत्रों ने कालेज के इन नपूसंक नीच अधिकारियों की घोर निन्‍दा की।

तिलक जी का केसरी पत्र इस फार्ग्यूसन कालेज के अंधिकारियों के विरुद्ध कई सप्ताह तक झाग उगलता रहा । अनेक शहरों में इसी प्रकार विदेशी वस्त्रों की होली जलाई गई । अनेक नगरों और कस्बों में सभायें हुईं । जिनमें सावरकर की प्रशंसा के प्रस्ताव पास हुए ।

अर्थ दण्ड पूरा करने के लिए चंदा किया गया। वह धनराशि बहुत अधिक थी, अतः सार्वजनिक व्यावसायिक निधि को दान दी गईं। बम्बई विश्वविद्यालय ने इस घटना की और कोई ध्यान नहीं दिया | अत: वीर सावरकर को परीक्षा में बठने की श्राज्ञा दे दी और वीर सावरकर कुछ
ही संप्ताहों की तंयारी से परीक्षा में उत्तीर्ण हों गया ।

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इस सफलता पर मंहाराष्ट्र के राष्ट्रीय नेताओं ने इन्हें वधाई दी । १६०५ ई० में सावरकर ने बी० ए० पास किंया। परीक्षां पास कर संस्थाओं के संगेंठन में लग गए। अपने संघ का नाम बदलकर “अभिनव भारत” कर दिया।

ये एक गायक मण्डलीं साथ लेकर महाराष्ट्र के अनेक नगंरों में प्रचारार्थ गये। भाषंण और गीतों का जनता पर प्रभाव पडता था । इससे चिढ़कर सरकार ने गीतों की सब प्रतियां जब्त कर लीं। प्रचार यात्रा से लौटकर सावरकर जी वकालत के लिए बम्बई चलेगये ।

उन्हीं दिनों जगतगुरु महर्षि दयानंद के प्रिय शिष्य श्यामजी कृष्ण वर्मा ने घोषणा की कि वह भारतीय विद्यार्थियों को विदेश के स्वतंत्र वातावरण में राजनीति का अध्ययन करने के लिए छात्रवृत्तियां एक सहस्त्र रुपया प्रति छात्रवृत्ति के लिए मासिक देंगे। वीर सावरकर ने छात्रवृत्ति प्राप्त करने के लिए प्रार्थना पत्र भेजा। लोकमान्य तिलक और श्री प्रांजय के प्रशंसा पत्रों से यह कार्य सहज में पूर्ण हो गया। क्योंकि इनके साथ श्याम जी का पूर्व से ही संबंध था।

विदेश जाने से पूर्व इनका विवाह जाहर राज्य के कश्मीरी दीवान श्री चपलूंकार की बड़ी लड़की से हो गया। इससे इन्हें आर्थिक कठिनाई से भी कुछ छुटकारा मिला इस समय पुलिस की इन पर क्रूर दृष्टि थी। इनकी गिरफ्तारी की संभावना थी किंतु सरकार ने विदेश जाने के कारण इन को गिरफ्तार नहीं किया।

यह भी श्याम जी की “शिवाजी छात्रवृत्ति” मिल जाने से विदेश जाने की तैयारी करने लगे। देश छोड़ने से पूर्व इन्होंने अपनी गुप्त सभा में स्पष्ट घोषणा की कि अब तक मैं पुणे में फारगुन कॉलेज में महाराष्ट्र के चुने हुए लोगों में अपने विचार फैलाता रहा हूं, परंतु अब मैं विदेश जाकर भारत भर के धनी और योग्य विद्यार्थियों में प्रचार करूंगा। वे लोग जब बैरिस्टर आदि बनकर भारत लौटेंगे तो देश भर में क्रांति मचा देंगे। मैं शत्रु के गढ़ में जाकर भारतीय शक्ति का लोहा दिखाऊंगा।

Veer Savarkar बोले मैं रूसी क्रांतिकारियों से बम और पिस्तौल बनाना सीख लूंगा । इस प्रकार भारतीय स्वतंत्रता शीघ्र ही हस्तगत हो जाएगी इन्होंने विदेश जाने से पूर्व मुंबई में भी अभिनव भारत संस्था की एक शाखा खोली अनेक कालेजों के विद्यार्थी इस में सम्मिलित हुए बिहारी नाम का मराठी भाषा का एक पत्र भी निकाला गया इसका विकास भी सहस्त्रों  की संख्या में होने लगा।

दोस्तों आज पहले भाग में इतना ही अगले भाग में हम पढ़ेंगे Veer Savarkar वीर सावरकर जी की विदेश यात्रा और वहां पर उन्होंने क्या-क्या कार्य किए विदेशों में रहते हुए

अगला भाग भी पढ़ें – Veer Savarkar In Hindi वीर सावरकर की जीवनी – भाग 2

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