Ashfaqulla Khan देशभक्त अशफाक उल्ला खान


Ashfaqulla Khan अशफाक उल्ला खान का जीवन हमें बहुत कुछ सीखा जाता है खासतौर से आज के मुस्लिम युवाओं को इन से काफी प्रेरणा लेनी चाहिए यदि मुस्लिम युवा की सोच Ashfaqulla Khan अशफाक उल्ला खान जैसी हो जाए तो इस देश का कोई भी राजनेता इस देश में दंगे नहीं करवा सकता आज जो मुस्लिम युवा भारत माता की जय बोलने से कतराते हैं वंदे मातरम बोलने से कतराते हैं उन्हें एक बार अशफ़ाकउल्ला को जरूर पढ़ना चाहिए।


Ashfaqulla Khan का जन्म शाहजहांपुर में हुआ था Ashfaqulla Khan का खानदान वहां के प्रसिद्ध रईसों में से था यह बचपन से ही खेलकूद कुश्ती आदि में बहुत रुचि रखते थे इनका शरीर लंबा चौड़ा था चेहरे पर रोब था तैरना घोड़े की सवारी तथा शिकार आदि खेलने में यह पारंगत थे। Ashfaqulla Khan जन्म से मुसलमान थे परंतु आप मुसलमान और हिंदुओं में कोई भेद नहीं समझते थे सबको यही कहा करते थे कि हम सब एक ही परमेश्वर के पुत्र हैं फिर हिंदू मुसलमान में भेद क्या है यह Ashfaqulla Khan ने अपने आचरण से भी स्पष्ट कर दिखलाया था।

आप बचपन में कविता सुंदर बनाते थे तथा गाया करते थे बचपन में आप देश के अंदर अत्याचारों को देखकर बहुत ही सोच विचार किया करते थे इन्हीं विचारों के कारण आपके मन के अंदर क्रांति की भावना उत्पन्न हुई आप क्रांतिकारी दल के सदस्य बन गए उस समय मैनपुरी षड्यंत्र में शाहजहांपुर के निवासी राम प्रसाद बिस्मिल के वारंट हो गए। इस बात को सुनकर आप बहुत प्रसन्न हुए कि मेरे विचारों वाला एक व्यक्ति शाहजहांपुर में है उससे मिलने के लिए आपने बहुत प्रयत्न किए किंतु वारंट होने के कारण उससे ना मिल सके जब उनके वारंट समाप्त हो गए तब उनसे मिलने के लिए गए पहले रामप्रसाद जी ने मिलने से मना कर दिया परंतु उनके आग्रह को देखकर इन्हें अपना साथी बना लिया ब्रह्मचारी राम प्रसाद बिस्मिल जी के साथ रहने के कारण आपके संबंधी कहा करते थे कि “तू काफिर हो गया है” इसका यह किंचित मात्र भी विचार नहीं करते थे।

Ashfaqulla Khan के सामने आर्य समाज मंदिर तथा मस्जिद

Ashfaqulla Khan के सामने आर्य समाज मंदिर तथा मस्जिद एक समान थे। शाहजाहा पुर में एक बार हिंदू तथा मुसलमानों का झगड़ा हो गया सारे शहर में मारपीट शुरू हो गई उस समय में आप Ram Prasad Bismil बिस्मिल जी से आर्य समाज मंदिर में बात कर रहे थे कुछ मुसलमान मंदिर के पास आ गए और आक्रमण करने के लिए तैयार हो गए।
Ashfaqulla Khan ने अपना पिस्तौल लिया और आर्य समाज मंदिर के सामने आकर मुसलमानों से कहने लगे कि मैं कट्टर मुसलमान हूं परंतु इस मंदिर की मुझे एक एक ईंट प्राणों से प्यारी है मेरे सामने मंदिर मस्जिद एक समान है यदि किसी ने दृष्टिपात किया तो गोली का निशाना बनाना पड़ेगा यदि तुमको लड़ना है तो दूर जाकर लड़ो उनकी इस सिंह गर्जना को सुनकर सब मुसलमानों के होश गुम हो गए।

Ashfaqulla Khan तथा Ram Prasad Bismil मित्रता


Ashfaqulla Khan तथा Ram Prasad Bismil दोनों में गुड मित्रता थी एक दूसरे को प्राणों से प्यारी समझते थे । 1 दिन की बात है कि Ashfaqulla Khan जी को दौरा पड गया उस समय “राम, राम, राम,” कह रहे थे घर वाले ना समझ पाए कि राम क्या है? उसी समय एक ने कहा राम, राम प्रसाद बिस्मिल है यह दोनों आपस में राम कृष्ण कहते थे बिस्मिल जी आए तब कहा आ गए राम इतने में दौरा समाप्त हो गया।


Ashfaqulla Khan काकोरी षड्यंत्र kakori train robbery

काकोरी षड्यंत्र Kakori Train Robbery में आप शामिल थे जब रेल रोकी गई तब आपको तथा आजाद को यह काम सौंपा गया कि कोई मनुष्य रेल से नहीं उतरे यदि कोई उतरे तो गोली से मार दिया जाए रेल से तिजोरी निकाली गई परंतु किसी से उसका ताला नहीं टूटा फिर आपने आकर उसका ताला तोड़ा उस षड्यंत्र में बहुत व्यक्तियों के वारंट हो गए और साथ साथ आपके भी वारंट हुए इससे आप फरार हो गए।

उस समय अशफाक उल्ला खान को बहुतों ने कहा कि आप दूसरे देशों में चले जाएं किंतु अशफाक उल्ला खान ने उत्तर दिया काम तो मेरा यहां है मैं दूसरे देशों में जा कर क्या करूंगा अंत में 8 दिसंबर 1926 में दिल्ली में पकड़े गए गिरफ्तार करके लखनऊ में लाए गए अदालत में पहुंचने पर स्पेशल मैजिस्ट्रेट सैयद अईनुदिन ने पूछा आपने मुझे कभी पहले देखा है अशफाक उल्ला खान ने कहा मैं तो आपको बहुत दिनों से देख रहा हूं जब से Kakori Kand काकोरी षड्यंत्र का मुकदमा आप की अदालत में चल रहा था तब से मैं आपको कई बार देख चुका हूं जब पूछा कि मैं कहां बैठता था उत्तर दिया साधारण मनुष्य के बीच राजपूत वेश में बैठा करते थे।

1 दिन सुपरिटेंडेंट खान साहब ने कहा देखो अशफाक तुम मुसलमान और हम भी मुसलमान हैं हमें तुम्हारी गिरफ्तारी से बहुत दुख है Ram Prasad Bismil आदि हिंदू हैं इनका उद्देश्य हिंदू राज्य स्थापना करना है तुम पढ़े-लिखे खानदानी मुसलमान हो तुम कैसे इन काफिरों के चक्कर में आगए। ये सुनते ही अशफाक जी की आंखें लाल हो गई और तीव्र स्वर से कहा बहुत हुआ खबरदार ऐसी बात फिर कभी ना खिएगा असल में रामप्रसाद जी आदि सच्चे हिंदुस्तानी हैं और आप जैसा कहते हैं अगर यह सत्य है तो भी मैं अंग्रेजी राज्य से हिंदू राज्य अधिक पसंद करता हूं आपने जो रामप्रसाद जी को काफिर कहा है उसके लिए मैं आपको इस शर्त पर छोड़ता हूं कि आप मेरे सामने से चले जाएं सुपरिटेंडेंट साहब नीचा मुंह करके चले गए।

अदालत में दर्शक और कर्मचारी आपका निर्भीकता पूर्ण व्यवहार देख कर दंग रह गए फांसी का तख्ता सिर पर झूल रहा था परंतु उन्हें कुछ भी प्रवा ना थी अंत में फैसला सुनाया गया इन पर पांच अभियोग लगे थे तीन में फांसी और 2 में काला पानी सजा हुई थी अदालत में आपको बिस्मिल का लेफ्टिनेंट कहा गया था।

इसके बाद अपील की किंतु सभी प्रयत्न व्यर्थ सिद्ध हुए और फांसी देना निश्चित हो गया।

फांसी की बात सुनकर आप को किंचित मात्र भी दुख अनुभव ना हुआ आप मुकदमा समाप्त होते ही फैजाबाद जेल में भेज दिए गए वहां पर कुछ साथी आपसे मिलने के लिए आए तब आप कुछ दुर्बल हो गए थे आपके मित्रों ने देख कर आश्चर्य किया तब आप ने उत्तर दिया कि आप समझते होंगे काल कोठरियों ने मुझे दुबला कर दिया परंतु बात ऐसी नहीं है मैं आजकल बहुत कम खाता हूं और ईश्वर की भक्ति करता हूं कम खाने से परमेश्वर की भक्ति में ज्यादा ध्यान लगता है।

फांसी से 1 दिन पहले कुछ साथी उनसे मिलने आए उसी दिन उनको पुराने कपड़े मिले थे उन्हें धोकर पहने तथा पैरों में जूता पहना उबटन लगाकर स्नान किया बाल कुछ लंबे थे उनको साफ करके फिर प्रसंता के साथ मित्रों से मिलने के लिए गए मित्रों से कहा आज मेरी शादी है दूसरे दिन प्रातः 6:00 बजे फांसी होनी थी।


Ashfaqulla Khanफांसी से 1 दिन पहले उन्होंने एक पत्र देशवासियों को लिखा था वह इस प्रकार है।

भारत माता के रंगमंच का अपना पार्ट आफ हम अदा कर चुके हैं हमने गलत या सही जो कुछ किया वह स्वतंत्रता प्राप्ति की भावना से किया हमारे इस काम की कोई निंदा करेंगे और कुछ प्रशंसा करेंगे क्रांतिकारी बड़े वीर होते हैं वे सदा अपने देश के लिए भला ही सोचते हैं मनुष्य कहते हैं कि हम देश को भयत्रस्त करते है किंतु यह बात गलत है इतने लंबे समय तक मुकदमा चला परंतु हमने किसी एक गवाह तक को ड्रा या नहीं ना किसी मुखबीर को गोली मारी हम चाहते तो किसी खुफिया पुलिस के अधिकारी या अन्य किसी आदमी को मार सकते थे किंतु यह हमारा उद्देश्य नहीं था हम तो कन्हाई लाल दत्त खुदीराम बोस गोपीमोहन शाह आदि की स्मृति में फांसी पर चढ़ जाना चाहते थे।

भारतवासी भाइयों आप कोई हो चाहे जिस धर्म या संप्रदाय के अनुयाई हो परंतु आप देश हित के कामों में एक होकर ही योग दीजिए आप लोग व्यर्थ में झगड़ रहे हैं सब धर्म एक हैं रास्ते चाहे भिन्न-भिन्न हो परंतु लक्ष्य सबका एक है फिर झगड़ा बखेड़ा क्या हम मरने वाले काकोरी अभियुक्तों के लिए आप लोग एक हो जाइए और सब मिलकर नौकरशाही का मुकाबला कीजिए यह सोच कर कि 7 करोड मुसलमान भारत में सबसे पहला मुसलमान मैं हूं जो भारत की स्वतंत्रता के लिए फांसी पर चढ़ा रहा हूं मन ही मन में अभिमान का अनुभव कर रहा हूं किंतु मैं यह विश्वास दिलाता हूं कि मैं हत्यारा नहीं जैसा कि मुझे साबित किया गया है।

ऐसा कहकर 6:00 बजे प्रातः काल अशफाक उल्ला खां फांसी पर चढ़कर परलोक सिधार गए फांसी के बाद उनके संबंधी शव को प्राप्त करना चाहते थे पहले तो निषेध कर दिया किंतु अधिक कहने पर उनका शव रिश्तेदारों को दे दिया गया शाहजहांपुर ले जाते समय जब लखनऊ पहुंचा तब कुछ मनुष्यों ने उनके दर्शन किए उनका कहना है कि फांसी के 10 घंटे बाद में उनके चेहरे पर रौनक थी तथा आंखों के नीचे कुछ पीलापन था।


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