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व्यायाम के लाभ ब्रह्मचर्य के साधन पार्ट4

शौच, दंत धवन, और मुख आदि अंगों की शुद्धि के पश्चात और स्नान से पूर्व प्रतिदिन प्रत्येक व्यक्ति खासकर ब्रह्मचारी को नियमित शारीरिक व्यायाम करना चाहिए साधारण व्यक्ति चाहे स्त्री हो या पुरुष जो भी भोजन करता है उसे व्यायाम की उतनी ही आवश्यकता है जितनी भोजन की इसका कारण स्पष्ट है शरीर में व्यायाम रूपी अग्नि ना देने से भोजन ठीक नहीं पचता और वह शरीर का अंग ना बनकर उल्टा हानी ही करता है क्योंकि जिन खाद पदार्थों से रक्त आदि धातुओं का निर्माण हो कर बल और शक्ति का संचय होता है उनके ठीक ना पचने से भी रोग होने लगते हैं और शरीर में दुर्गंध उत्पन्न करके जहां अनेक रोगों की उत्पत्ति का कारण बनते हैं वहां मनुष्य के मन में अनेक प्रकार के दुष्ट विचारों को भी जन्म देते हैं जिससे मनुष्य की बुद्धि भ्रष्ट हो कर समरण शक्ति भी मंद हो जाती है और उसे अपने कर्तव्य कर्म का ज्ञान नहीं रहता परिणाम स्वरुप दुखदाई विषय भोगो में फस जाता है और यह विषय, वासना की अग्नि मनुष्य के स्वास्थ्य शक्ति सुंदरता स्फूर्ति और सद्गुणों को जलाकर भस्म साथ कर डालती है यहां तक कि मनुष्य की सबसे प्रिय वस्तु युवावस्था भी इसी की भेंट चढ़ जाती है दुखदाई बुढ़ापा आता है मनुष्य का शरीर निर्बलता और रोगों का घर बन जाता है जिससे लोक और परलोक दोनों ही बिगड़ जाते हैं ।

व्यायाम और स्वास्थ्य

व्यायाम किए बिना स्वस्थ रहना असंभव है। परमपिता परमात्मा ने हमें रोगी और दुखी होने के लिए नहीं बनाया हम तो दुखों और रोगों को स्वयं बुलाते हैं और पुनः रोते और पछताते हैं हमने स्वास्थ्य के मूलाधार exercise को जब से छोड़ा तभी से हमारी यह भयंकर दुर्गति हुई है जिसको लिखते हुए भी लज्जा आती है। आज क्या बालक क्या युवा सभी रोगी हैं क्योंकि हम ऋषियों की प्यारी शिक्षा ब्रह्मचर्य और इसके मुख्य साधन व्यायाम को छोड़ बैठे और उनके स्थान पर विषय भोग विलास और कामवासना के पीछे भागते हैं आज के युवक और युवतियां व्यायाम से प्रेम नहीं करते इन्हें अखाड़े और व्यायाम शाला में जाना रुचिकर नहीं इन्हें तो सिनेमा थिएटर और नाचघर प्यारे हैं नगरों में सिनेमा घरों के आगे भारी भीड़ लगी रहती है और अखाड़े खाली पड़े रहते हैं क्या हुआ एक आध सौभाग्यशाली व्यक्ति उधर मुंह करता है इतने पर भी स्वास्थ्य और बल की आशा करते हैं हमारे युवक अखाड़े में जाकर करें भी क्या कि इन्हें तो दंड बैठक और कुश्ती से इसलिए घृणा है कि कहीं इनके कोमल शरीर को अखाड़े की धूल मिट्टी ना लग जाए और इनके सुंदर वस्त्र व शरीर ही ना बिगड़ जाए ऐसे ही व्यायाम भीरु नपुंसकों से यह देश भरा पड़ा है।

भोले युवकों को इतना भी ज्ञान नहीं कि यदि एक मशीन को बरस भर ना चलाया जाए तो उसकी दशा कितनी बिगड़ जाती है उसे पुनः चालू करने के लिए नई मशीन के मूल्य से भी कहीं अधिक धन व्यय करना कर देना पड़ता है इसी प्रकार हमारा शरीर भी व्यायाम का कार्य ना करने से सर्वथा निर्बल, विकर्त और रोगों का घर बन जाता है उन्हें यतन करने पर भी ठीक होने को नहीं आता सब जानते हैं कि तालाब का पानी स्थिर होने से ही सकता है और नदी झरनों काजल चलने के कारण ही निर्मल और कांच के समान चमकता है इसी प्रकार exercise ना करने से भी रक्त का संचार भली-भांति नहीं होता इसलिए अनेक प्रकार के मल शरीर में रुकने वक्तृत्व होने से रक्त मलीन और गंदा होकर अनेक रोगों की उत्पत्ति का कारण बनता है व्यायाम से रक्त का संचार और शुद्धि होती है। सब अंगों में बल स्फूर्ति और शक्ति आती है व्यायाम लक्षा कुदरती सौंदर्य कांति और बल को उत्पन्न करता है सबरंग पतंगों को पूर्ण और पुष्ट करता है वास्तव में व्यायाम शरीर के लिए सबसे बढ़कर पुष्टि दायक और स्वास्थ्य पर है उचित व्यायाम से प्राय सभी रोग रुक जाते हैं आज तक संसार में कोई ऐसा मनुष्य नहीं हुआ जिसने बिना व्यायाम के परम आरोग्य और स्वास्थ्य की प्राप्ति की हो व्यायाम का भाव से ही लोगों का स्त्रोत है पूर्ण सुख और स्वास्थ्य की प्राप्ति का एकमात्र साधन exercise है।

व्यायाम के लाभ

जैसा कि पहले ही लिखा जा चुका है स्वास्थ्य प्राप्ति का मुख्य साधन व्यायाम ही है अब इसकी पुष्टि में रिसीव महरिशी ओं एवं अन्य अनुभवी व्यायाम आचार्यों का मत देते हैं परम वेद महरिशी धन्वंतरी का मत

महर्षि धन्वंतरी जी लिखते हैं exercise से शरीर बढ़ता है शरीर की कांति और सुंदरता बढ़ती है। शरीर के सब अंग सुडोल होते हैं पाचन शक्ति पढ़ती है आलस्य दूर भागता है शरीर दर्द और हल्का होकर स्फूर्ति आती है तथा तीनों दोषों की शुद्धि होती है थकावट दुख प्यासी पोषण ता नी गर्मी आदि सहने की शक्ति व्यायाम से ही आती है और परम आरोग्य अर्थात आदर्श स्वास्थ्य की प्राप्ति भी exercise से ही होती है।

चरक संहिता में इसी विषय में लिखते हैं

व्यायाम से शरीर में लघुता यानी की स्फूर्ति हल्का पन फुर्तीला पन कार्य करने की शक्ति स्थिरता क्लेश तथा दुखों का सहना दोषों जैसे वात पित्त कफ का नाश और जठराग्नि की वृद्धि होती है।

प्रोफेसर राम मूर्ति के जीवन की एक घटना

इस विषय में प्रोफेसर राम मूर्ति के जीवन की एक घटना दी जाती है और वह इस प्रकार है कि यूरोप में इन्हें नीचा दिखाने के लिए कुछ पापियों ने भोजन में धोखे से विष दे दिया जब इन्हें पता चला तो इन्होंने एक साथ 10 से 15000 दंड लगा डाली सर्विस पसीने के द्वारा बाहर निकल गया और वे बच गए।

व्यायाम करने वाले का शरीर अत्यंत शुद्ध व निर्मल और निर्दोष हो जाता है मन मित्रा दी थी कृति से निकल जाते हैं कभी मल बंधवाने के कब्ज नहीं होता उसे या चिंता नहीं करनी पड़ती की लैट्रिंग आएगी वह नहीं सोच दोनों समय खुलकर आता है आमा सेवा जठराग्नि को बल देने वाला सबसे सस्ता और सर्वोत्तम योग यानी नुस्खा व्यायाम ही है व्यायाम करने वाले को मंदाग्नी का रोग कभी नहीं होता।वह जो भी पेट में डाल लेता है वह सब कुछ शीघ्र ही पक्ष का शरीर का अंग बन जाता है उसका खाया पिया भी दूध आदि पोस्टिक भोजन उसके शरीर में ही लगता है लैट्रिंग में नहीं निकलता है उसकी बन सकती दिन प्रतिदिन बढ़ती ही चली जाती है उसके अनुप्रयोग की विधि यथा योग्य होती है शरीर के अंगों को सुडौल सघन गठीला और सुंदर बनाना व्यायाम का प्रथम कार्य है।यदि कोई मनुष्य केवल 1 वर्ष निरंतर नियम पूर्वक किसी भी exercise को कर ले तो उसका शरीर सुंदर और सुंदर बनने लगता है और जो सदैव श्रद्धापूर्वक दोनों से मैं यथा विधि व्यायाम करते हैं उनका तो कहना ही क्या उनके शरीर की सभी मांसपेशियां लोहे की भौतिक कड़ी और सुदृढ़ हो जाती है और सभी नस नाडिया संपूर्ण स्नायु मंडल और शरीर का प्रत्येक अंग व जल का खुलासा के समान कठोर और सुदूर हो जाता है चौड़ी छाती लंबी सुडौल और गधी भी भुजाएं सीवीपिंडिया चढ़ी हुई जंग आए विशाल मस्तक तथा चमचम आता हुआ रक्त वर्ण लाल मुख मंडल उसके शरीर की शोभा को बढ़ाता है यथा विधि exercise करने से शरीर का प्रत्येक अंक तेज वृद्धि को प्राप्त हो कर अत्यंत सुंदर और सघन बन जाता है शरीर पर चर्बी चढ़कर उसे हिला नहीं करने पाता पेट से लगा रहता है बढ़ने नहीं पाता।

ब्रह्मचर्य के साधन पार्ट 1 Free Pdf Download

ब्रह्मचर्य के साधन पार्ट 2 Free Pdf Download


ब्रह्मचर्य के साधन पार्ट 3 Free Pdf Download


इसीलिए सभी मनुष्यों को दीर्घायु और समस्त जीवन प्राप्त करने के लिए व्यायाम अवश्य ही करना चाहिए जो बयां नहीं करते वह शीघ्र ही बीमारी से मृत्यु को प्राप्त होते हैं और पूरी उम्र जीवन भर रोगी और दुखी ही रहते हैं।

दोस्तों यह लेख और यह पीडीएफ जो आपको दी है इसको व्हाट्सएप और फेसबुक पर शेयर जरूर करना ताकि मेहनत सफल हो नमस्ते जय श्री राम

ब्रह्मचर्य के साधन पार्ट4


दांतों और मसूड़ों को मजबूत करने के उपाय ब्रह्मचर्य के साधन पार्ट3


दांतों और मसूड़ों को मजबूत करने के उपाय ब्रह्मचारी ही क्या प्रत्येक मनुष्य को प्रातः काल उठकर चक्षु स्नान उषा पान एवं सोच के पश्चात ऊपरी भाग को शुद्ध करना चाहिए रात्रि में सोकर जो प्रातः मनुष्य उठता है मुंह के अंदर जमा हुआ गंदा मल मिलता है जिससे मुंह और दांतों में से दुर्गंध आने लगती है दुर्गंध को दूर करना और दातों की शुद्धि करना अत्यंत आवश्यक है वेद भगवान की इस विषय में सबके लिए आज्ञा है कि तुम्हारे दांत निर्मल हो इसलिए हमारे ऋषियों ने प्रतिदिन दंत धवन दातुन करने का नियम बनाया है आयुर्वेद के प्रसिद्ध और प्राचीन शास्त्र चरक में लिखा है। दांतों और मसूड़ों को मजबूत करने के उपाय

प्रतिदिन दो समय कसैले, कटु तथा रसप्रधान वृक्ष की जिसके आगे भाग को चबाकर कूंची (बुरुश) के सामान कर लिया हो ऐसे दंतपवन दांतो से दंतमांस ( मसूड़ों ) को अभीघात ( चोट ) से बचाते हुए दातुन करें ।

दांतों और मसूड़ों को मजबूत करने के उपाय दातुन करने के लाभ

दांतों और मसूड़ों को मजबूत करने के उपाय प्रतिदिन दातुन करने से जिहवा, दांत और मुंह के अंदर का मल निकल जाता है दुर्गंध तथा विरसता नष्ट होते हैं और रुचि बढ़ती है उपर्युक्त गुण दातोन से तत्काल ही प्राप्त हो जाते हैं।

दातुन मुख की दुर्गंध और दूषित कफ को बाहर निकाल देती है मल आदि की चिकनाई को दूर करती तथा अन में रूचि और मन में प्रसन्नता उत्पन्न करती है।

दांतों और मसूड़ों को मजबूत करने के उपाय इन परमाणु से सिद्ध होता है कि मुख और दातों की शुद्धि के विज्ञान पर प्राचीन ऋषियों ने बड़ी भारी खोज की है और प्रतिदिन दातुन करने पर बल दिया है यह बहुत ही महत्वपूर्ण बात है क्योंकि मुख शरीर का वह अवयव है जिसके द्वारा हमारे पेट में जो भोजन पहुंचता है और इसमें दांत आदि अवयव भी वहीं रखे गए हैं जो भोजन को उदर तक पहुंचाने में सहायक होते हैं दांत भोजन को चबाकर पचाने योग्य बनाते हैं दांतों को भोजन चबाते समय जीभ भोजन को उलटने पलटने में सहायता देती है और इसका स्वाद भी बताती है। बोलना शब्द करना आदि भी मुख का कार्य है जिस प्रकार शरीर में मुख 1 आवश्यक अंग है उसी प्रकार मुंह में दांत भी बड़े महत्वपूर्ण हैं दांतों के द्वारा आयु का ज्ञान होता है इनसे स्वास्थ्य की अवस्था भी जानी जा सकती है जब तक दांत है तब तक ही भोजन का स्वाद आता है पीछे तो पेटी भरना होता है।दांतो से ही मुख की सुंदरता है दांतो के होने से मुख चेहरा भरा हुआ प्रतीत होता है दांतो के अभाव में चेहरा भी थक जाता है और गाल अंदर को थक जाते हैं मनुष्य की आकृति बिगड़ कर कुरूप हो जाती है। दांतों और मसूड़ों को मजबूत करने के उपाय

शब्दों का उच्चारण शुद्ध और स्पष्ट नहीं होता दांतो के नाम भी प्रथक प्रथक है जैसे दाने की लें और दांत हमारे दांत मुंह के जिस भाग में गड़े हुए होते हैं उसे मसूड़ा कहते हैं दांत दो बार निकलते हैं एक तो बाले काल के दूध के दांत जो आठ 10 वर्ष की आयु में ही गिर जाते हैं पुन: नए अन्न के दांत उत्पन्न होते हैं जो सावधानी रखने पर अंत तक कार्य देते हैं जो व्यक्ति 100 वर्ष से अधिक आयु भोगते हैं उनके तीसरी बार भी दांत उगते देखे गए हैं किंतु यह दांत निर्बल और बहुत छोटे होते हैं। दांतों और मसूड़ों को मजबूत करने के उपाय

दांतों और मसूड़ों को मजबूत करने के उपाय दातुन का परिमाण कितनी बड़ी दातुन करनी चाहिए

दातुन कितनी मोटी तथा लंबी होनी चाहिए इस विषय में महरिशी धन्वंतरी shushurt  में लिखते हैं

अर्थात दातुन 12 उंगली लंबी और सबसे छोटी अंगुली के समान मोटी और सरल होनी चाहिए वह गुथी हुई गांठगठीली और टेढ़ी मेढ़ी न हो। उसमें कोई छिद्र ना हो अर्थात किसी प्रकार का कीड़ा आदि ना लगा हो और विकार रही हो। जहां दो शाखाएं हो ऐसी गांठ वाली नए होनी चाहिए दातुन का अगला भाग मृत्यु होना चाहिए जिसकी अच्छी कूची बन सके और जिस वृक्ष की दातुन हो वह श्रेष्ठ युद्ध भूमि में उत्पन्न हुआ होना चाहिए इच्छा हुई जिस किसी वृक्ष की दातुन थोड़ी और करने लगे ऐसा करने से किसी विषय अथवा हानिकारक व्हिस्की भूल से दातुन की जा सकती है। दांतों और मसूड़ों को मजबूत करने के उपाय

इसलिए दातुन का एक ही स्थान पर ‘’विज्ञातवृक्षम’’ ऐसा विशेषण दिया है अर्थात जिस वृक्ष के दातुन अपनी प्रकृति के अनुकूल और लाभदायक हो उसकी दातुन करनी चाहिए अज्ञात वृक्ष की दातुन कभी ना करें आयुर्वेद के ग्रंथों में अनेक वृक्षों के दातुन का विधान है।

चरक में लिखा है किस वृक्ष के दातुन करें दांतों और मसूड़ों को मजबूत करने के उपाय

करंट कनेर आग मालती अर्जुन तथा आसन आदि वृक्ष तथा इनके समान गुणों वाले अन्य वृक्षों की भी तातुन करनी चाहिए इसी प्रकार महरिशी धन्वंतरी भी सुशुरत में लिखते हैं

कड़वे वृक्षों में नीम कसैले वृक्षों में खैर मधुरो में महुआ और कटु फेरस वालों में वृक्षों में करंज की दातुन श्रेष्ठ होती है इसी प्रकार एक अन्य स्थान पर लिखा है

आक, बड़, खेर, करंज, से बढ़कर करण और अर्जुन आदि उसी प्रकार कषाय कटु और चित्र वाले अन्य वृक्षों की दातुन ले और उसके अग्रभाग को चबाकर ऐसे मिलूं ऊंची बना ले कि उसे दांतो को खींचते समय मसूड़ों को रगड़ना पहुंचे इसी प्रकार कहीं ग्रंथों में एक ईमेल अपामार्ग कदंब आम्र बांस दिल अब और उधर आदि वृक्षों की दातुन करने का भी विधान है।

दांतों और मसूड़ों को मजबूत करने के उपाय दातुन किस वृक्ष की हो

दांतों और मसूड़ों को मजबूत करने के उपाय नीम की दातून

निघंटु में नीम के विषय में लिखा है नीम कड़वा शीतल सूजन और वायु का समन करता है नेत्रों के लिए हितकारी फिल्मी हित और विष नाशक है अत्यंत रक्तशोधक है इसी प्रकार के अनेक गुण और भी लिखे हैं इसीलिए नीम की दातून भी मसूड़ों वा दांतो के सब रोगों के लिए लाभदायक है पेट के कीड़े दूर करने वाली है। यूनानी इलाज की पुस्तक (इलाजुलगुरबा) मैं लिखा है जो मनुष्य नीम की दातुन करता है उसे कोई रोग नहीं होता और ना उसके दांतो में पीड़ा होती है रक्त के सभी दोष को दूर करके सर्वदा शुद्ध कर देती है ज्वर के रोगियों के लिए हित कारक है। भोजन में रुचि उत्पन्न करती है फोड़े फुंसियों से सुरक्षित रखती है गर्मी से बचाती है और कुपित कप का संबंध करती है उल्टी को रोकती है।पर मैं आदि वीर्य के रोगों के लिए लाभदायक है नेत्र ज्योति को पढ़ाती और रक्षा करती है रक्त दोष के रोगियों के लिए प्रतिदिन नीम की दातुन का प्रयोग बहुत अच्छा है और सामान्य लोगों के लिए वसंत ऋतु में अर्थात फाल्गुन वा चेत्र के दिनों में नीम की दातून बहुत अच्छी रहती है इससे रक्त संबंधी विकार नहीं होती।

महानीम बकायन की दातुन के भी लगभग कई लाभ होते हैं जो नीम की दातुन के बताए गए हैं।

दांतों और मसूड़ों को मजबूत करने के उपाय खदिर खेर की दातुन

कशेले वृक्षों में खदिर खैर की दातुन श्रेष्ठ मानी है खदिर का संस्कृत में एक नाम दंतधावन भी है भाव प्रकाश निघंटु में खदिर शीतल दांतो को हितकारी कड़वा, कदुवाज, कषेला और खुजली खांसी अरुचि, मेद (चर्बी) कृमि, प्रमेह, ज्वर, कुष्ठ सूजन पित्त रक्त विकार पांडुरोग कफ तथा कुष्ठ रोग को नष्ट करता है।

इसलिए जिसको कोटवा में मोटापा रोग हो और इसी प्रकार रख दो उसके रोगी और चर्म रोगियों को खैर वृक्ष की दातुन करनी चाहिए कबीर की दातुन मुंह के छालों और मसूड़ों की पीप को दूर करती है कफ प्रकृति वाले मोटे फूले हुए मनुष्य के लिए भी खैर की दातुन लाभदायक है किंतु इसका वृक्ष सब स्थानों पर नहीं होता इसलिए सर साधारण इससे लाभ नहीं उठा सकते।

दांतों और मसूड़ों को मजबूत करने के उपाय बबूल की दातुन

कषाय रस वाले वृक्षों में बबूल की कर का वृक्ष भारतवर्ष के सभी भागों में पाया जाता है इसकी दातुन पड़ा है सभी लोग करते हैंबबूल भी इसी का नाम है इसके गुणों पर दृष्टिपात करने से विदित होता है कि यह एक ऐसा वृक्ष है कि जिस की दातुन बिना भेदभाव के प्रत्येक मनुष्य कर सकता है क्योंकि यह सभी के लिए हित कारक है भावप्रकाश निघंटु में लिखा है

बबूल ग्राही और कफ और गर्मी तथा विष नाशक है बबूल कड़वा, काषेला, मीठा, चिकना, ठंडा, तीक्ष्ण, ग्राही आमातिसार और रक्तिसार को बंद करने कफ, कास, उष्णता, दाहा, वायु और प्रमह को दूर करने वाला है। बबूल का वृक्ष सभी स्थानों पर पाया जाता है और सभी प्रकृति वालों के अनुकूल होता है दातुन में जो गुण होने चाहिए वह सभी इसमें है इसलिए इसकी दातुन का प्रचार भारतवर्ष में प्राचीन काल से चलाता है आज भी भारत में शिक्षित और अशिक्षित और सभी मतों के अनुयाई इसकी दातुन का प्रयोग करते हैं यथार्थ में कीकर की दातुन में सारे ही गुण उठ उठ कर रहे हैं दांतो के लिए हितकारी तिक्त कषाय मधुर और कटुक राय चारों ही रस किस में पाए जाते हैं कीकर की दातुन जहां दांतो को अत्यंत शुद्ध करती है वहां साथ ही इसका प्रयोग पाचन शक्ति को बढ़ाता है।

दांतों और मसूड़ों को मजबूत करने के उपाय महुवे की दातुन

मीठे वृक्षों में महोबे की दातुन श्रेष्ठ मानी जाती है यह भूख को शुद्ध करती है और मुंह के छाले मूछों की उष्णता और सूजन को दूर करती है।

दांतों और मसूड़ों को मजबूत करने के उपाय करंज की दातुन

चर करे रस के वृक्षों में करंज की दातुन श्रेष्ठ होती है यह वृक्ष रक्त दोष और कफ को नष्ट करता है वर्षा ऋतु के पश्चात जब विषम ज्वर मलेरिया फैलता है उन दिनों में करंट की दातुन करने से मनुष्य विषम ज्वर से बचा रहता है।

दांतों और मसूड़ों को मजबूत करने के उपाय कचनार की दातुन

कचनार की दातुन कफ के रोग और कंठ के रोगियों के लिए विशेषकर कंठमाला के लिए अत्यंत लाभदायक है।

दांतों और मसूड़ों को मजबूत करने के उपाय अर्जुन की दातुन

अर्जुन की दातुन ह्रदय रोगियों के लिए अत्यंत लाभदायक है या मसूड़ों को शुद्ध करती और दांतो को शुद्ध बनाती है।

दांतों और मसूड़ों को मजबूत करने के उपाय तेजबल की दातुन

यह प्रसिद्ध पर्वतीय वृक्ष है इसकी दातुन बसंत ऋतु में करनी चाहिए इसका प्रयोग करने से कब के रोग नहीं सताते इसकी दातुन का शोर समाज के रोगियों को बड़ी लाभदायक है यह मुख की दुर्गंध को दूर करती पाचन शक्ति को बढ़ाती और कंट्रोल नाशक है और भी अनेक लाभ है किंतु यह सब स्थानों पर ना मिलने से सब मनुष्य लाभ नहीं उठा सकते।

दांतों और मसूड़ों को मजबूत करने के उपाय पीपल की दातुन

पीपल का वृक्ष भारत के सभी भागों में पाया जाता है यह मीठा कशाला शीतल भारी रख दोष जलन उष्णता कब और फोड़े फुंसियों को दूर करने वाला है रंग को निहारता है शरीर का सूखना और पित जवरो के लिए अत्यंत लाभदायक है।

दांतों और मसूड़ों को मजबूत करने के उपाय करने वाली विशेष मंजन बनाने की विधि

कभी दातुन ना मिलने पर किसी विशेष अवस्था में दांतो को शुद्ध करने के लिए कुछ लाभदायक ही योग पाठकों के लाभार्थी लिख देते हैं इनका स्वस्थ अवस्था में भी दातुन के समान लाभ होता है।

मंजन का सरल योग

दांतों और मसूड़ों को मजबूत करने के उपाय इस मंजन का साधारण अवस्थाओं में दातुन के स्थान पर भी प्रयोग किया जा सकता है यह सर्वत्र बिना किसी मुल्ले के प्राप्त हो सकता है योग बहुत ही अच्छा है देशी गोवंश के गोबर के उपलों की भसम यानी की राख लेकर उसको अच्छे से कपड़े छान कर ले यदि जंगल में चरने वाली गोवंश का गोबर मिल जाए उसकी राख मिल जाए तो और भी अच्छा है वही मंजन है इसको मंजन की आवश्यकता पड़ने पर दांत और मसूड़ों पर मंजन की भांति मल कर शुद्ध जल से कुल्ला करें हींग लगे ना फिटकरी रंग चोखा दे वाली बात इस मंचन पर घटती है। यह बिना पैसे का मंजन दांतो को इतना शुद्ध कांति में चमकीला बना देता है कि जिसके आगे बहुत मूल्यवान लहंगे मंजन भी फीके पड़ जाते हैं सबसे बड़ी बात यह है कि इसके प्रयोग से दांतों के कीड़े दूर हो जाते हैं दांत और मसूड़े सर्व प्रकार के मनुष्य शुद्ध और पवित्र होकर सदैव रोगों से सुरक्षित रहते हैं दांतो की पीड़ा और रोगों के दूर करने में यह रामबाण है।

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बड़ी-बड़ी रसायनशाला और और दालों के स्वामी तथा बड़े-बड़े वेद भी इसका प्रयोग करते हैं दांतों की पीड़ा दूर करने में यह जादू का असर करती है।

इसी में स्वामी ओमानंद जी अपनी कुछ सत्य घटना लिखते हैं वह लिखते हैं कि गुरुकुल रावल की घटना है एक आर्य सन्यासी दांतो की पीड़ा के कारण अत्यंत कष्ट में थे उनको किसी प्रकार भी शांति ना होती थी और कई दिन से सोए नहीं थे वह भी कार्य वर्ष वहां गए हुए थे इस घोर कष्ट के कारण उनके मुंह से जो शब्द निकल रहे थे उन्होंने मेरी नींद रा भंग कर दी मैंने उस समय जैसी भसम प्राप्त हुई उसका प्रयोग कर दिया उसी समय वे शांत होकर सो गए और उनका कष्ट दूर हो गया।

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ब्रह्मचर्य के साधन पार्ट3

चक्षु स्नान उष:पान और शौच आदि ब्रह्मचर्य के साधन पार्ट 2 Free Pdf Download


प्रातः काल उठकर ईश्वर चिंतन के पश्चात चक्षु:स्नान करना चाहिए जिस की विधि निम्न प्रकार से हैं।

उषा पान शुद्ध जल जो ताजा और वस्त्र से छना हुआ हो लेकर इससे मुंह को इतना भर लो कि उसमें और जल ना आ सके अर्थात पूरा भर ले इस जल को मुख में ही रखना है साथ ही दूसरे शुद्ध जल से दोनों आंखों में बार-बार छींटे दो जिससे रात्रि में शयन समय जो मल अथवा उष्णता आंखों में आ जाती है वह सर्वथा दूर हो जाए इस प्रकार इस क्रिया से अंदर और बाहर दोनों ओर से चक्षु इंद्रिय को ठंडक पहुंचती है निर्थक मल और उष्णता दूर होकर दृष्टि बढ़ती है इस क्रिया को प्रतिदिन करना चाहिए।

यह क्रिया आंखों की ज्योति के लिए अत्यंत लाभदायक है इसको प्रतिदिन श्रद्धा पूर्वक करने से नेत्रों के सब रोग दूर होकर वृद्धावस्था तक आंखों की ज्योति बनी रहती है।

२ उषा पान

इसके पश्चात उष:पान ( उषा पान ) करें प्रातः काल 4:00 बजे के पश्चात जो जल शौच (मल, मूत्र त्याग) से पूर्व पिया जाता है उसे उष:पान कहते हैं।

उषा पान से पूर्व भली-भांति कुल्ली करके मुख नासिका आदि को साफ करना आवश्यक है पहले दांतो को अंगुली से भलीभांति रगड़ कर दो तीन बार कुल्ला करें फिर अंगूठे या उंगली से रगड़ कर जीभ का तथा गले में नीचे ऊपर तथा दाएं बाएं लगा हुआ कफ आदि मल भली-भांति साफ कर डालें। नासिका के दोनों क्षेत्रों को भी जल से शुद्ध कर ले यदि नासिका और मुंह को भली-भांति शुद्ध किए बिना उषा पान (जलपान) किया जाएगा तो रात्रि में शयन काल में हमारे उदर से जो मल मुख के द्वारा बाहर निकलने के लिए आता है वह जल के साथ पुनः पेट में पहुंचकर गड़बड़ी करेगा।

उषा पान के प्रकार

उषा पान दो प्रकार से किया जाता है प्रथम नासिका द्वारा दूसरा मुख् द्वारा लाभ दोनों से ही होता है पहले मुख द्वारा ही जल पीने का अभ्यास करना चाहिए शने शनेे नासिका के द्वारा भी जल पीने का प्रयास कर सकते हैं किंतु यदि नासिका से पीना हो तो बाई नासिका से धीरे-धीरे थोड़ा जल अंदर जाने दें इस जल को मुंह से थूक दे इस प्रकार नासिका को शुद्ध करके नासिका से जल पीना चाहिए।

उषा पान नासिका द्वारा जल पीने की विधि इस प्रकार-

गिलास में या किसी जल पात्र में जिसके किनारे पतले हो जल भर सुविधा पूर्वक बैठकर गिलास का किनारा बाय नथुने से लगाकर धीरे धीरे जल अंदर जाने दे कंठ से घुट खींचता जाए जल स्वयं ही भीतर जाने लगेगा जल को श्वास की सहायता से ना खींचे बलपूर्वक यह क्रिया करने से जल का ठस्का लग सकता है आरंभ में कुछ कष्ट होता है किसी के तो आंखों में आंसू भी आ जाते हैं कुछ झनझनाहट सी उत्पन्न होती है और थोड़ा सा जुकाम भी प्रतीत होता है किंतु इससे घबराना नहीं चाहिए पहले दिन एक या दो तोला जल्दी फिर धीरे-धीरे बढ़ाता जाए भावप्रकाश में 24 तोले जल पीना लिखा है किंतु प्रत्येक मनुष्य अपनी प्रकृति के अनुसार न्यून व अधिक कर सकता है किसी किसी को वायु के कारण डकारे बहुत आती है क्योंकि जल के साथ पेट में वायु भी जाती है इससे घबराना नहीं चाहिए बाई नासिका से जल पीने से हानि कोई नहीं होती बाय नथुने का चंद्रशेखर होने से शीतलता और शांति रहती है किसी को नासिका से जल पीने से कष्ट होता है तो मुख ही पीता रहे।

जल पीकर ही मल मूत्रत्याग करें यह सदैव ध्यान रखना चाहिए कि प्रत्येक अवस्था में मल मूत्र त्याग से पूर्व ही उषा पान करना आवश्यक है जल मीठा और शुद्ध होना चाहिए कुए का ताजा जल सदैव अच्छा रहता है उष्ण काल में सांय काल का रखा हुआ शुद्ध जल भी अच्छा रहता है बहुत ठंडा और गर्म पानी हानि करता है जिनको मलबंद (कब्ज) रहता हो वे सांय काल तांबे के पात्र में जल रख दें और प्रातः उसका पान करें।

उषा पान के लाभ

उषा पान के अनेक लाभ आयुर्वेद के ग्रंथों में लिखे हैं धन्वंतरि संहिता में लिखा है

जो मनुष्य सूर्योदय से कुछ पहले 8 अंजलि जल पीता है रोग और बुढ़ापा उसके पास नहीं आते वह सदैव स्वस्थ और युवा रहता है उसकी आयु 100 वर्ष से भी अधिक होती है

इसी प्रकार भावप्रकाश में लिखा है

बवासीर, सूजन, संग्रहणी ज्वर, पेट के रोग, बुढ़ापा, कुष्ठ, मेद रोग अर्थात बहुत मोटा होना, पेशाब का रुकना, रक्तपित्त, आंख, कान, नासिका, सिर, कमर, गले इत्यादि के सब शुल (पीड़ा) तथा वात, पित्त, कफ और फोड़े इत्यादि होने वाले अन्य सभी रोग उषा पान से दूर होते हैं।

इसी प्रकार एक अन्य स्थान पर लिखा है

नासिका द्वारा प्रतिदिन शुद्ध जल की तीन घुट वा अंजलि प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त में पीनी चाहिए क्योंकि इससे झुर्रियां पड़ना, बुढ़ापा, बालों का सफेद होना, पीनस नाक का सड़ना, या नासिका में कीड़े पड़ना आदि नासिका रोग प्रतिष्याय जुकाम, स्वर का बिगड़ना, विरसता, कास व खांसी सूजन आदि रोग नष्ट हो जाते हैं। और बुढ़ापा दूर होकर पुनः युवावस्था प्राप्त होती है आयु की विर्धी अर्थात दीर्घायु की प्राप्ति होती है। चक्षु संबंधी सब रोग दूर होते हैं और नेत्र ज्योति इस प्रकार जलनेति करने से खूब बढ़ती है अतः ब्रह्मचर्य तथा प्रत्येक स्वस्थ स्त्री व पुरुष को प्रतिदिन मुख वा नासिका द्वारा उषा पान का अमृत पान करके अमूल्य लाभ उठाना चाहिए।

३ शौच

जल पीकर पहले लघुशंका(मूत्र त्याग) करें तत्पश्चात खुले जंगल में जाकर मल त्याग करें सोच के लिए ग्राम से जितना भी दूर जाओ उतना ही अच्छा है इसमें मनु जी महाराज का प्रमाण है

मल मूत्र का त्याग, पैर धोना वा जूठन का फेंकना आदि कार्य घर वा निवास स्थान से दूर ही करें।

मनु जी की आज्ञा के अनुसार प्रातः काल उत्तर की ओर और सांय काल दक्षिण की ओर मुख करके शौच के लिए बैठे जैसा कि आगे लिखा है मुख तथा दांतो को बंद रखें बाएं पैर पर दबाव रख कर बैठना अच्छा है इससे सोच खुलकर आता है सोच के समय बल लगाना बहुत ही हानिकारक है बल लगाने से वीर्य नष्ट हो जाता है जो मल स्वयं आजावे वही ठीक है।

यदि सोच ना आए तो

यदि सोच खुलकर नहीं आता और स्थाई मल बंध कबज का रोग रहता है तो जल पीकर शौच जाने से पूर्व पेट के पश्चिमोतान आसन, मयूर आसन, आदि आसन तथा अन्य हल्के व्यायाम करें पेट को खूब हिलाएं फिर शौच जाएं। मार्ग में जाते समय मन में यह दृढ़ निश्चय करें कि मुझे शीघ्र सोच आ रहा है और यदि मैं जल्दी से नहीं चला तो मार्ग में ही मल निकल कर वस्त्र खराब हो जाएंगे मल त्याग के लिए बैठ जाने पर भी इसी प्रकार का ध्यान करें कि सब मल गुदाद्वार के द्वारा बाहर निकल रहा है ऐसा करने से मलमद नहीं होगा ऐसे दृढ़ निश्चय और ध्यान का हमारे शरीर पर बड़ा प्रभाव पड़ता है इसे हंसी समझकर टाल न दे यथार्थ में हम शरीर के स्वामी ना बनकर दास बने हुए हैं इसलिए अनेक कष्ट उठाने पड़ते हैं।

ब्रह्मचर्य के साधन पार्ट 1 Free Pdf Download

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सुबह जल्दी उठने के फायदे ब्रह्मचर्य के साधन पार्ट 1 Free Pdf Download

सुबह जल्दी उठने के फायदे दोस्तों इन शब्दों से आप जान ही गए होंगे कि इस लेख में आपको कितनी महत्वपूर्ण जानकारी मिलने वाली है मैं इसमें इतनी महत्वपूर्ण जानकारी आपको दूंगा कि आपको कहीं और यह जानकारी नहीं मिलेगी देखे दोस्तों यह part-1 है ब्रह्मचार्य के साधन का पार्ट 1 है क्योंकि सबसे पहले हमें सुबह जल्दी उठना पड़ता है जो व्यक्ति ब्रह्मचार्य का पालन करना चाहता है और हमेशा निरोगी और स्वस्थ रहना चाहता है उसे प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त में ही उठ जाना चाहिए अर्थात 3:30 बजे और 4:00 बजे तक उठ जाना चाहिए यदि कोई व्यक्ति अपने आप को ब्रहाचारी कहता है तो उस व्यक्ति की परीक्षा करने का सबसे आसान और पहला साधन यह है कि वह सुबह 4:00 बजे के बाद में कभी सोता हुआ ना मिले। सुबह जल्दी उठने के फायदे


सुबह जल्दी उठने के फायदे  ब्रह्मचर्य के साधन पार्ट 1

दोस्तों स्वामी ओमानंद जी ने एक पुस्तकब्रह्मचर्य के साधन लिखी थी तो इस पुस्तकों को 11 भाग में लिखा गया था तो 11 के 11 भाग मैं लेख के माध्यम से और वीडियो बनाकर आपके सामने ला दूंगा जिससे कि अधिक से अधिक व्यक्तियों तक ब्रह्मचार्य के बारे में अधिक से अधिक जानकारी विस्तार से पहुंचे और वह पूरा पूरा लाभ उठा पाए।


सुबह जल्दी उठने के फायदे

ब्रह्मचारी हो या गृहस्थ जो भी जीवन में उन्नति करना चाहता है उसे सबसे पूर्व प्रातः उठने का ही अभ्यास करना चाहिए मनु महाराज ने प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर आवश्यक कर्तव्य कर्म करने का इस प्रकार विधान किया है।

ब्रह्म मुहूर्त में उठकर धर्म और अर्थ का चिंतन करना चाहिए अपने शरीर के क्लेशों और उनके कारणों पर विचार करना चाहिए और वेद के तत्वों का अध्ययन करना चाहिए।

सुबह जल्दी उठने के फायदे



सुबह जल्दी उठने के फायदे एक अन्य स्थान पर भी ऐसा ही लिखा है

आयु की रक्षा के लिए ब्रह्ममुहूर्त में उठने और शरीर की चिंताओं को छोड़कर सोच स्नानादि करके स्वस्थ चित्त होकर ईश्वर का ध्यान आदि नित्य कर्मों को करें प्रात काल उठने से मनुष्य स्वस्थ रहता है उसको रोग नहीं होता अतः निरोग शरीर अधिक वर्षों तक कार्य कर सकता है प्रात काल उठने के असंख्य लाभ शास्त्रकारों ने बतलाए हैं।


सुबह जल्दी उठने के फायदे महर्षि दयानंद जी भी इस विषय में संस्कार विधि में लिखते हैं-

सदा स्त्री-पुरुष 10:00 बजे सो जाएं और रात्रि के पिछले पहर वह 4:00 बजे उठकर प्रथम हृदय में परमेश्वर का चिंतन करके धर्म अर्थ का विचार करना और धर्म अर्थ के अनुष्ठान व उद्योग करने में यदि कभी पीड़ा भी हो तथापि धर्म युक्त काम ना छोड़ना चाहिए किंतु सदा निरंतर उद्योग करके व्यवहारिक और परमार्थिक कर्तव्य कर्म की सिद्धि के लिए ईश्वर उपासना भी करनी कि जिस परमेश्वर की कृपादृष्टि और सहाय से महाकठिन कार्य भी सुगमता से सिद्ध हो सके।
सुबह जल्दी उठने के फायदे

इसलिए प्रातः उठते ही सर्वप्रथम निम्न मंत्रों से ईश्वर की प्रार्थना करनी चाहिए यदि आप को ये मंत्र ना आए तो आप केवल ओ३म या गायत्री मंत्र से भी ईश्वर की प्रार्थना कर सकते हैं।

इन मंत्रों का अर्थ विस्तार पूर्वक जप करने से अधिक लाभ होता है इनका अर्थ महर्षि दयानंद कृत संस्कार विधि के ग्रह आश्रम प्रकरण में देख लेना बहुत प्राचीन काल से अथवा यों कहिए आदि सृष्टि से प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त में उठने का विधान है बाल्मीकि रामायण इसमें प्रमाण है।

राम और सीता जब पहर रात शेष रही तब वे उठे और नौकर चाकरों को सारे भवन को साफ कर सजाने की आज्ञा दी।

रात्रि के पश्चिमयाम व चौथे पहर का नाम ब्रह्ममुहूर्त है शास्त्रकारों ने इसी समय को अमृतवेला व देववेला भी कहा है यह ब्रह्म का अर्थात “ देवनदेवत्र” देवों के देव महादेव जिसका मुख्य और निज नाम ओ३म है के स्मरण करने का सर्वश्रेष्ठ समय है। देव लोक अर्थात विद्वान इस मुहूर्त में बिरहा की भक्ति व भजन में रत रहते हैं और उस समय प्रेममय प्रभु अपने सच्चे श्रद्धालु भक्तों पर आनंद अमृत की वर्षा करते हैं।

ऐसा प्रतीत होता है कि देव पूजा अर्थात ईश्वर स्तुति प्रार्थना उपासना आदि सभी शुभ कार्यों के लिए ही ईश्वर ने इस उत्तम समय की रचना की है इस समय स्वभाव से ही पापी से पापी मनुष्य का भी ईश्वर भक्ति आदि शुभ कार्य में मन लगता है और असुरों में भी इस समय आसुरी वृत्ति का लोप हो जाता है राक्षसों में भी देवता बनने की प्रवृत्ति जागृत होती है इसलिए पशु-पक्षी आदि सभी प्राणी स्वभाव से ही प्रात: उठ जाते हैं नवजात बालक भी स्वयं में प्रातः उठकर हमें यह शिक्षा देता है कि प्रभु का यह पवित्र समय प्रमाद में पड कर सोने का नहीं है।

एक कवि ने अपने सुंदर शब्दों में कितना अच्छा लिखा है।

भोर भयो पक्षी गण बोले, उठो जन प्रभु गुण गाओ रे।

लखो प्रभात प्रकृति की शोभा बार-बार हर्षाओ र ।

प्रातः काल की संध्या जब तक नक्षत्र आकाश में रहे विधि पूर्वक करें और जब तक सूर्य का दर्शन ना हो गायत्री का अभ्यास जप करता रहे।

मनु महाराज भी लिखते हैं

अर्थात प्रातः काल की संध्या को गायत्री का को करता हुआ सूर्य दर्शन होने तक स्थिर होकर और सांयकाल की संध्या को नक्षत्र दर्शन ठीक ठीक होने तक बैठकर करें।

इसीलिए प्राचीन काल में सभी भारतवासी इस पवित्र ब्रह्म मुहूर्त में ईश्वर चिंतन, योगाभ्यास ही करते थे। इस अमृतवेला का सदुपयोग करने के कारण ही प्राचीन ऋषि महर्षि अमर पद मोक्ष की प्राप्ति करते थे।इसीलिए आज तक उनके यश और कीर्ति के गीत गाए जाते हैं जो प्रतिदिन बहुत प्रातः उठकर श्रद्धा पूर्वक ईश्वर का ध्यान करेगा वह देवमार्ग का पथिक बन कर मोक्ष पद को पाएगा। क्योंकि ब्रह्म मुहूर्त का समय इतना अच्छा होता है कि इस समय यम नियमों की स्वयं सिद्धि होती है परस्पर का व्यवहार ना होने से हिंसा करने का या असत्य बोलने का अवसर ही नहीं आता। स्वभाव से अहिंसा और सत्य का प्रसार होता है। चोर भी अपनी चोरी से निवृत्त होकर इससे पूर्व भी अपने स्थान पर चले जाते हैं कामी पुरूष भी रात्रि में बहुत देर से सोने के कारण इस समय आलस्य प्रमाद में पड़े सोते व मक्खी मच्छर मारते रहते हैं अहिंसा, सत्य, असत्य, ब्रह्मचार्य आदि यम नियमो का स्वयं वातावरण होने से यह योगाभ्यास, ईश्वर भक्ति, का सर्वोत्तम समय है।


सुबह जल्दी उठने के फायदे

किसी कवि ने ठीक ही कहा है-

अमृतवेला जाग पवित्र हो कर आसन ले जमा।

ईश्वर के गुण धारण करके, समीप दिन दिन होता जा।

प्रीति प्राण आधार की अपना रंग जमायेगी।।

भक्ति कर भगवान की काम तेरे जो आएगी।

पाप भरी जो आत्मा निश दिन दीन धुलती  जाएगी।।

इसी प्रकार इसी भाव को एक अन्य कवि ने कितने सुंदर शब्दों में कहा-

भगवान भजन करने को जो प्रात: समय उठ जाता है।

आनंद की वर्षा होती है दुनिया में वह सुख पाता है।।

देर तक सोने का नुकसान

जो सूर्य उदय के पश्चात अथवा दिन में सोता है उस सोने वाले के तेज़ को उदय होता हुआ सूर्य हर लेता है जैसे अपने शत्रुओं के तेज को एक तेजस्वी पुरुष ले लेता है।

तेज व वर्चस उस शक्ति व गुण का नाम है जिसके कारण मनुष्य सब प्रकार के उन्नति करता है तेज़ तत्व का स्वभाव ही आगे बढ़ना है हम थोड़े से आलस्य के कारण केवल प्रात काल न उठकर उन्नति के मूल तत्व को खोकर सर्वथा तेज हीन हो रहे हैं। कितने दुख और मूर्खता की बात है कि प्रातः काल का समय दिन का मूल्य बाल्यावस्था है जैसे बाल्यकाल में अच्छे व बुरे जैसे भी संस्कार डाल दिए जाते हैं उनका प्रभाव मरते समय तक रहता है संस्कारों की छाप अटल और अमिट है जो प्रातः काल की अमूल्य अमृतवेला को नष्ट कर देता है उसका संपूर्ण दिन ही नष्ट हो जाता है जैसे प्रातः काल बीतेगा वैसे ही संपूर्ण दिन की गति होगी।

प्रोफेसर राममूर्ति की जीवनी कलयुग का भीम Part1

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प्रातः काल उठने की बात छोटी सी दिखाई देती है किंतु इसका महत्व और फल बड़ा भारी है इसका अभ्यास पर्याप्त परिश्रम के पीछे पक्का होता है सदैव निरंतर नियम से प्रातः उठने वाले व्यक्ति बहुत थोड़ी संख्या में पाए जाते हैं किंतु महापुरुष बनने वाले ऐसे ही व्यक्ति होते हैं जैसे वृक्ष और भवन की जड़ और नीव भूमि में छुपी रहती है साधारणतया देखने वाले को इसका कोई महत्व नहीं प्रतीत होता किंतु मूल के अभाव में वृक्ष और नीव के बिना भवन टिक नहीं सकते इसी प्रकार प्रातः उठने का गुण छोटा सा दिखाई देता है किंतु यह अपने धारण करने वाले के जीवन को पवित्र और महान बना देता है इतने पर ऐसे भारी लाभप्रद गुण को कोई धारण ना करे तो उससे बढ़कर अभागा और कौन हो सकता है इस महत्व को प्रकट करने वाली महर्षि दयानंद जी के जीवन की एक घटना आती है घटना इस प्रकार है।-

एक दिन एक पादरी और एक मिशनरी महिला ऋषि दयानन्द महाराज से मिलने आए उनसे महाराज ने कहा कि धन की अधिकता जाति की अवनति का कारण हुआ करती है जैसा कि वह आर्य जाति के पतन का कारण हुई और उदाहरण रूप से कहा कि इसी कारण से अंग्रेजों की दिनचर्या बिगड़ती जाती है पहले हम जब सूर्योदय से पूर्व भ्रमण करने आया करते थे तो बहुत से अंग्रेज स्त्री पुरुषों को वायु सेवन करते देखते थे परंतु अब वह बहुत दिन गए उठते हैं इसलिए अब इनका राज्य नहीं रहेगा।
सुबह जल्दी उठने के फायदे

प्रातः काल ना उठने वाला मनुष्य स्वास्थ्य, आयु, बल, ब्रह्मचार्य, राजकाज सब कुछ खो बैठता है अतः प्रत्येक ब्रह्मचार्य प्रेमी तथा उनके चाहने वाले स्त्री-पुरुष को प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त में ही उठना चाहिए।
सुबह जल्दी उठने के फायदे

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सुबह जल्दी उठने के फायदे दोस्तों यह लेख सभी के फायदे के लिए लिखा है इसलिए इसको ज्यादा से ज्यादा शेयर करना मत भूलना यदि आप अपनी संस्कृति को बचाना चाहते हैं तो अपना यह छोटा सा प्रयास मात्र शेयर करना बिलकुल भी मत भूलना ताकि अधिक से अधिक युवक युवतियां सुबह उठने के महत्व को समझें और देश की उन्नति में अपना योगदान दें। नमस्ते, ओ३म

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व्यायाम का महत्व vyayam ka mahatva short essay in hindi

व्यायाम का महत्व Vyayam Ka Mahatva दोस्तों आज इस लेख में आप व्यायाम से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त करेंगे जिसे पढ़कर आप में एक जिज्ञासा उत्पन्न होगी कि आप भी आज से ही व्यायाम शुरू कर दें जिससे कि आप सुखी और स्वस्थ जीवन जी सकें और किसी पर बोझ ना रहे दोस्तों व्यायाम का महत्व पर एक महत्वपूर्ण छोटी सी पुस्तिका है जिसे स्वामी ओमानंद जी ने लिखा था नीचे उसको डाउनलोड करने का लिंक दिया गया है वहां से आप इस छोटी सी पुस्तिका को डाउनलोड कर सकते हैं और अपने जीवन में लाभ उठा सकते हैं।

व्यायाम का महत्व vyayam ka mahatva short essay in hindi

व्यायाम का महत्व
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दोस्तों पुरुष हो या महिला हम सभी भोजन करते हैं और जो व्यक्ति बिना व्यायाम के रहते हैं उनका भोजन कभी नहीं पचता अनेकों रोगों का वह भोजन कारण बन जाता है क्योंकि वह पचता नहीं आपके पेट में सड़ जाता है। और हम सभी को अधिकार है कि हम हम सभी अपना शरीर स्वस्थ बना सकें क्योंकि जो स्वस्थ मनुष्य होते हैं उनके लिए धरती स्वर्ग के समान होती है किंतु जो रोगी होते हैं उनके लिए यही धरती नर्क के समान होती है चाहे उस व्यक्ति के पास में कितना भी धन क्यों ना हो फिर भी यदि वह व्यायाम का महत्व नहीं समझ पाता है तो रोगी ही रहता है और जल्दी ही मौत के मुंह में पहुंच जाता है। benefits of Exercise in Hindi

मैं आपको छोटी सी सत्य घटना बताता हूं प्रोफेसर राम मूर्ति का नाम तो आपने सुना ही होगा यदि नहीं सुना है तो गूगल पर आप सर्च कीजिए उनके बारे में आपको महत्वपूर्ण जानकारी मिलेगी प्रोफेसर राममूर्ति व्यायाम का महत्व समझते थे और ब्राहाचर्य का महत्व भी समझते थे प्रोफेसर राममूर्ति खूब व्यायाम करते थे और ब्रह्मचारी भी थे जिसके कारण उनके शरीर में बहुत ही अधिक बल था और वह हमेशा अधिक से अधिक भयंकर से भयंकर और आश्चर्यचकित कर देने वाले करतब दिखाया करते थे वह हाथी को अपनी छाती पर 5 मिनट तक रोकने में समर्थ थे। एक बार वह यूरोप में गए हुए थे तो वहां पर उनसे कुछ लोग घृणा करते थे जिसके कारण उन्होंने प्रोफेसर राममूर्ति के भोजन में विश मिला दिया और प्रोफेसर राम मूर्ति को इस बात का पता चल गया लेकिन तब तक उन्होंने भोजन कर लिया था। तब प्रोफेसर राम मूर्ति ने 15000 दंड लगा दिए और पसीने के द्वारा सारा विश शरीर से बाहर निकाल दिया। प्रोफेसर राममूर्ति को कलयुग का भीम भी कहा जाता है।


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जब आप और हम व्यायाम करते हैं तो पसीने के द्वारा हमारे शरीर से अनेकों प्रकार का विष बाहर निकल जाता है यह बात वही समझ सकता है जो व्यायाम का महत्व समझता हो।

ब्रह्मचारी राम प्रसाद बिस्मिल एक महान क्रांतिकारी थे जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपने प्राण दे दिए इन्हीं के संगठन में चंद्रशेखर आजाद और भगत सिंह भी शामिल हुए थे उनकी जीवनी यदि आपने पढ़ी होगी तो आप जानते होंगे कि राम प्रसाद बिस्मिल पहले बहुत ही गलत संगति में पड़े हुए थे उनको नशे की आदत भी थी लेकिन जब उन्हें सत्यार्थ प्रकाश पुस्तक मिली तो वह लिखते हैं कि सत्यार्थ प्रकाश पुस्तक को पढ़कर उनका जीवन ही बदल गया और उन्होंने उस में लिखे हुए ब्राहाचर्य के पालन के सख्त नियम पालन करने शुरू कर दिए राम प्रसाद बिस्मिल जी सिर्फ एक कंबल को तकत पर बिछा कर सोया करते थे और सुबह 4:00 बजे उठ जाया करते थे फिर व्यायाम आदि किया करते थे ईश्वर की उपासना किया करते थे और ब्राहाचर्य के पालन से ही उनमें बहुत ही अधिक बल था सामने से कोई भी दुश्मन उनको देखकर डर कर भाग जाया करते थे राम प्रसाद बिस्मिल जी के बारे में जानने के लिए उनकी आत्मकथा पढ़िए उसे डाउनलोड करने का लिंक भी आपको नीचे ही मिल जाएगा।

राम प्रसाद बिस्मिल जी एक बात कहा करते थे कि यदि विद्यार्थियों के पास में व्यायाम करने का समय कम है तो उन्हें प्रोफेसर राम मूर्ति की दंड लगानी चाहिए इस दंड से कुछ समय में ही अच्छा खासा व्यायाम हो जाता है तो मुझे उम्मीद है कि आप इन बातों पर ध्यान देंगे और आज से ही व्यायाम और ब्रह्मचर्य का पालन शुरू कर देंगे जिससे कि आप वास्तव में इस देश का कुछ भला कर पाए।


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