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महारानी लक्ष्मी बाई की वीरता की छोटी से कहानी

महारानी लक्ष्मी बाई का जन्म 1835 में बनारस में हुआ था। उनके पिता का नाम मोरोपंत तांबे था वे महाराष्ट्र के ब्राह्मण थे लक्ष्मी बाई का जन्म का नाम मनु बाईं था। अंतिम पेशवा के भाई जीवनजी आपा पेशवाई समाप्त होने पर काशी चले आए इनके पास ही मोरोपंत तांबे काशी में रहते थे कुछ समय पश्चात आपा जी का देहांत हो गया तांबे जी विवश हो आपा जी के भाई बाजीराव पेशवा के पास बिठूर चले गए।वही अपना जीवन यापन करने लगे चार 5 वर्ष की आयु में मनु बाई की माता जी की मृत्यु हो गई तांबे जी ही ने मनु बाई का पालन पोषण किया पेशवा भी मनु बाई से विशेष प्रेम करता था मनु बाई पेशवा के दत्तक पुत्र नाना साहब के साथ खेलना लिखना पढ़ना घोड़े पर चढ़ना शिकार खेलना तलवार चलाना आदि सब कार्य सिकती थी। जो कार्य नाना साहब करते उसी का वह भी अनुकरण करती थी नाना साहब से भी शीघ्र सब कार्य में निपुणता प्राप्त कर लेती थी एक दिन नाना साहब को हाथी पर चढ़ता देख मनु बाई भी हाथी पर चढ़ने का आग्रह करने लगी पेशवा ने कहा तेरे भाग्य में हाथी की सवारी कहां है मनु बाई को बात चुभ गई उसने तुरंत उत्तर दिया मेरे भाग्य में एक हाथी नहीं 10 हाथी लिखे हैं वह हीन भावना कभी नहीं रखती थी थोड़े ही समय में वह लिखने पढ़ने के साथ युद्ध विद्या में भी पारंगत और निपुण हो गई। rani lakshmi bai

मनु बाई (rani lakshmi bai) अत्यंत रूपवती थी उसका 8 वर्ष की आयु में ही झांसी के राजा गंगाधर से विवाह हो गया विवाह के समय ही उसका नाम लक्ष्मीबाई रख दिया गया 16 वर्ष की आयु में लक्ष्मी बाई को एक पुत्र उत्पन्न हुआ किंतु वह शीघ्र ही मर गया। जिसके कारण राजा गंगाधर को बड़ा दुख हुआ उसी पुत्र के वियोग से शोक के कारण उनका शरीर दिन-प्रतिदिन दुर्बल होने लगा और इसी दुख और चिंता से ही उनकी मृत्यु हो गई मरने से पूर्व उन्होंने एक पुत्र गोद लिया इस दत्तक पुत्र का नाम दामोदर राव था महारानी लक्ष्मी बाई जी ने अपने पति की अंत्येष्टि क्रिया विधिवत की।

महारानी लक्ष्मी बाई

इस समय महारानी लक्ष्मी बाई की आयु 18 वर्ष की थी। उसे यह अथाह दुख सहना पड़ा पति के वियोग का दुख दूसरा राज्य के प्रबंध का भार उस समय केवल उसकी आशा का केंद्र उसका दतक पुत्र ही था। महारानी लक्ष्मी बाई ने कंपनी सरकार के पास प्रार्थना पत्र भेजा कि सरकार उनके दतक पुत्र को राज्य का उत्तराधिकारी स्वीकार कर ले किंतु सरकार ने कुछ समय तक तो उसका कुछ उत्तर ही नहीं दिया फिर rani lakshmi bai ने दूसरा प्रार्थना पत्र भेजा उसका भी कोई उत्तर न मिला उत्तर ना देने का रहस्य यही था कि अंग्रेजी सरकार rani lakshmi bai के दतक पुत्र को स्वीकार नहीं करना चाहती थी धूर्त लॉर्ड डलहौजी ने रानी को एक आज्ञा पत्र भेजा कि कंपनी सरकार ने झांसी के राज्य को अंग्रेजी राज्य में मिला लिया , लक्ष्मी बाई किला खाली करते।

 

महारानी लक्ष्मी बाई लार्ड का पत्र पाकर बहुत दुखी तथा व्याकुल हो गई उसको जो आघात पहुंचा वह अवर्णनीय है। महारानी लक्ष्मी बाई मूर्छित होकर गिर पड़ी कुछ दिन तो बहुत दुखी रही विवशता में पेंशन स्वीकार करनी पड़ी महारानी लक्ष्मी बाई ने एक सती साध्वी के समान पवित्र जीवन बिताना प्रारंभ किया। प्रातः काल 4:00 बजे उठना, स्नान ध्यान पूजा प्रतिदिन गीता का पाठ आदि श्रद्धा पूर्वक करती थी 8:00 बजे नित्य कर्म से निर्मित हो महल के अंदर ही भ्रमण व्यायाम आदि करती थी इसके पश्चात अपने हाथ से 11 सो राम नाम की आटे की गोलियां बनाकर मछलियों को खिलाती थी।फिर रात के 8:00 बजे तक गीता आदि धर्म शास्त्र को सुनती थी उसके पश्चात भजन भोजन करके ईश्वर का स्मरण करती हुई सो जाती थी यही उसका प्रतिदिन का कार्य था उसके पिता मोरोपंत अन्य घर का काम संभालते थे।

महारानी लक्ष्मी बाई के साथ जो व्यवहार अंग्रेजों ने किया यह सारी जनता को खटकता था लॉर्ड डलहौजी की यह स्वार्थ पूर्ण नीति भी स्वतंत्रता युद्ध का एक कारण बना था मध्य भारत उत्तर भारत के बीच झांसी का राज्य अंग्रेजों के लिए एक महत्वपूर्ण केंद्र था इसे वह कैसे छोड़ सकते थे इस स्थान से सिंधिया तथा अन्य राज्यों को वश में किया जा सकता था इसीलिए दत्तक पुत्र को स्वीकार ना करके झांसी को अपने अधीन करना अंग्रेज अति आवश्यक समझते थे। किंतु इस व्यवहार से जनता में अंग्रेजो के प्रति अत्यंत घिरणा उत्पन्न हो गई महारानी लक्ष्मी बाई भी अवसर की खोज में थी तथा धीरे-धीरे तैयारी में लगी हुई थी । 1857 की क्रांति की अग्नि जब देश में भड़की तो झांसी भी कैसे शांत रह सकती थी क्रांति ने अपना रूप दिखाया।

4 जून 1857 को झांसी में 12 नंबर पलटन के हवलदार गुरबख्श सिंह ने किले के मैगजीन और खजाने पर कब्जा कर लिया इसके पश्चात लक्ष्मी बाई ने महल से निकल के स्वयं शस्त्र धारण कर क्रांतिकारी सेना का सेनापति बनना स्वीकार किया। उस समय लक्ष्मी बाई की आयु 21 वर्ष की थी 7 जून को रिसालदार काले खान तहसीलदार मोहम्मद हुसैन ने किले पर हमला किया किले के अंदर की देसी पलटन भी इनके साथ मिल गई किला भी हाथ में आ गया। रिसालदार काले खान की आज्ञा से 67 अंग्रेज मार दिए गए यह कार्य महारानी की आज्ञा के बिना ही सैनिकों ने कर डाला इतिहास लेखक सर जान के लिखता है कि इस हत्याकांड में महारानी लक्ष्मी बाई का कोई संबंध नहीं था ना उसका कोई आदमी मौके पर था ना उसने इसकी आज्ञा ही दी थी अंत में उसी दिन झांसी से कंपनी का राज्य हटा दिया गया बालक दामोदर के संरक्षक के रूप में रानी लक्ष्मी बाई झांसी की गद्दी पर बैठे कंपनी का झंडा उतार दिया गया सम्राट का हरा झंडा झांसी पर फहराने लगा सारे राज्य में स्वतंत्रता की घोषणा कर दी गई।

महारानी लक्ष्मी बाई rani lakshmi bai

गुलाम गौस खां को मुख्य तोपची बनाया गया उसने रानी को सलामी की तोपे दागदी तोपों की मरम्मत की गई नयी तोपे ढलने लगी बारूद बनने लगे भाऊ बक्शी को तोपे ढालने का कार्य सौंपा गया । लक्ष्मणराव प्रधानमंत्री नियुक्त हुआ प्रधान सेनापति दीवान जवाहर सिंह को बनाया गया पैदल सेना के तीन कर्नल मोहम्मद जमाल खान दीवान रघुनाथ सिंह और खुदा बख्श नियुक्त हुए। घुड़सवारों की मुख्य सेनापति स्वयं महारानी जी बनी और कर्नल सुंदर, मुंदर और काशीबाई बनाई गई। यह तीनों रानी की सहेलियां थी। न्यायाधीश नाना भोटकर बनाए गए और मोरोपंत कमठाने के प्रधान गुप्तचर विभाग मोती बाई के हाथ में दिया गया

नायाब जूही को बनाया गया सारे विभागों को सौंपकर सुप्रबंद कर दिया गया। झांसी में सब कार्य सुव्यवस्थित रूप से चलने लगा झांसी का राज्य लेने पर अंग्रेजों ने सब पुरानी तोपों में किल्ली ठोक कर उन्हें बेकार कर दिया था उन्हें ठीक करने का कार्य तुरंत चालू किया पुरानी तोपें ठीक कर दी गई गुलाम गौस ने कुछ तोपें भूमि में गड़ी हुई पड़ी थी उनको भी संभाल लिया।

महारानी लक्ष्मी बाई rani lakshmi bai

गोले गोलियां बनाने का तलवार बंदूक पिस्तौल आदि तैयार करने का कार्य भी चालू कर दिया गया नए हथियार बनाने में कुछ समय लगता इसलिए जहां मिले पुराने हथियार इकट्ठे किए गए जनता ने जी खोलकर रुपया दिया 13 जून की रात को महारानी लक्ष्मी बाई को गुप्त चर मोतीबाई ने सूचना दी सदाशिवराव जो झांसी गद्दी का दावेदार था उसने कुछ सेना इकट्ठी कर ली है वह कटेरा में था झांसी को वह अनाथ समझता था उसने दो 1 दिन के भीतर ही अपना अभिषेक करवा लिया और अपने आप को झांसी का महाराजा कहने लगा इधर महारानी ने भी शीघ्र ही तैयारी कर बड़े वेग से अपने घुड़सवारों को लेकर कटेरा को जा घेरा। बड़ी कठिनाई से वह जान बचाकर भाग गया उसने सिंधिया के राज्य में नरवर में जाकर शरण ली।

सिंधिया ने कुछ सेना से उसकी सहायता की किंतु महारानी लक्ष्मी बाई ने उसे नरवर में घेर कर पकड़ लिया और कैदी बनाकर झांसी के दुर्ग में बंद कर दिया सुंदर और काशी बाई ने इस युद्ध में अच्छी वीरता दिखाई इसी प्रकार उन दिनों कहीं डकैती भी हो जाती थी महारानी के सूपरबन्ध  के कारण सर्वत्र राज्य में शांति थी किंतु कुंवर सागर सिंह नाम का डाकू झांसी के राज्य में कहीं डाका डाल चुका था उस प्रांत का थानेदार उस डाकू को नहीं पकड़ सका महारानी लक्ष्मी बाई की आज्ञा से खुदा बख्श 25 सैनिक घुड़सवार लेकर बरवासागर में उस डाकू को पकड़ने के लिए गया उसने उस डाकू सागर को उसके गांव में अपने मकान में ही घेर लिया दोनों ओर से गोलियां चली मकान के अंदर छत पर चढ़कर खुदा बख्श मकान के अंदर सिपाहियों सहित कूदा किंतु सागर सिंह ने खुदा बख्श को तलवार से जख्मी करके भाग गया यह सूचना महारानी को झांसी में मिली रानी अपनी सहेलियों सहित 25 घुड़सवार साथ लेकर स्वयं डाकू को ठीक करने के लिए चली वर्षा अधिक होने से बेतवा नदी में भयंकर बाढ़ आई थी। नाव नहीं लग सकती थी आंधी चल रही थी रानी ने सबको कूदने की आज्ञा दी बहुत साहास का कार्य था। ईश्वर कृपा से सब नदी पार की।

बरवासागर पहुंचकर आराम किया । पता लगा के डाकू जंगल में है उसको महारानी लक्ष्मी बाई ने जंगल में जा घेरा और एक टोली ने सागर सिंह का गांव रावली जा घेरा डाकू एक गुफा में भोजन कर रहे थे उन पर अकस्मात आक्रमण हुआ वह हड़बड़ा गए खाना पीना छोड़ घोड़ों की नंगी पीठ पर बैठ कर दून की निकास की ओर भागे तीन और से बंदूक चल रही थी किंतु डाकुओं का एक व्यक्ति भी घायल नहीं हुआ निकास के द्वार पर तीनों सहेलियों और मोती बाई सहित महारानी लक्ष्मी बाई तैयार खड़ी थी जब डाकू उधर भागे तो उधर से पांच बन्दूक चली घोड़े मरे डाकू घायल हुए डाकुओं ने भी बन्दूक चलाई रानी का दल आड़ में था अतः कोई प्रभाव नहीं हुआ डाकू सिर पर पैर रखकर भागे काशी सुंदर और मोती बाई ने प्रथक प्रथक पीछा किया रानी और सुंदर बाई के हाथ में नंगी तलवार और गले में सोने का आभूषण था।

कुछ पीछे घोड़े पर सवार एक डाकू निकला महारानी लक्ष्मी बाई समझ गई यही सागर सिंह है दोनों ने उसका पीछा किया दोनों सपाटे से उस पर टूट पड़ी किंतु सागर सिंह बचाव करता हुआ आगे बढ़ा भूमि नरम कीचड़ वाली आ गई सागर सिंह का घोड़ा अटकने लगा rani lakshmi bai और सुंदर बाई के घोड़े काठियावाड़ी और बड़े प्रबल थे सागर सिंह को एक और रानी ने दूसरी ओर से सुंदर बाई ने दबाया सागर सिंह rani lakshmi bai को पहचान गया उसने rani lakshmi bai पर आत्मरक्षा के भाव से वार किया तुरंत सुंदर बाई ने चप्पल गति से तलवार डाकू पर उठाई वार ओ ओछा पड़ा घोड़े की पीठ पर। उधर रानी ने घोड़े को रोक वह कुछ अंगुल पीछे हुई सागर सिंह का वार उनसे आगे खींच गया । rani lakshmi bai ने अपनी तलवार का वार ऐसा कसा की सागर सिंह की तलवार के दो टुकड़े हो गए डाकू के घोड़े की पीठ कट चुकी थी वह तेज ना दौड़ सका सुंदर बाई तलवार का वार करना चाहती थी rani lakshmi bai ने रोक दिया और कहा जीवित पकड़ना है rani lakshmi bai ने आगे बढ़कर सागर सिंह की कमर में हाथ डाला सुंदर भाई समझ गई क्या करना है सुंदर ने दूसरी ओर से अपना हाथ डाल दिया और झटका देकर घोड़े की पीठ से उठा लिया सागर सिंह ने खिसकने का यतन किया किंतु वज्रपात में फंसा था विफल रहा।

दांतो से काटना चाहता था कि महारानी लक्ष्मी बाई ने कहा यदि मुंह खोला तो तलवार ठूंस दूंगी थोड़ी देर में दल के और व्यक्ति भी मिल गए सागर सिंह रस्सियों से बांध दिया गया। बरवासागर पहुंचने तथा विश्राम करने पर डाकू से पूछताछ की डाकू ने बताया वह ठाकुर है अंग्रेजों की अधीनता स्वीकार ना करके डाकू बना है उन्होंने स्त्रियों और दरिद्रो को कभी ना सताया डाकू ने प्रार्थना कि मुझे फांसी ना देकर गोली या तलवार से प्राण दंड दिया जाए। rani lakshmi bai ने पूछा कि यदि तुम को छोड़ दूं तो क्या करोगे उसने कहा कि डाके डालूंगा किंतु आपके राज्य में नहीं अथवा श्री चरणों की नौकरी करके लड़ाई में पराक्रम दिखाऊंगा महारानी लक्ष्मी बाई ने उसे क्षमा प्रदान की डाकू ने गंगा की शपथ खाकर डाके का कार्य छोड़ दिया और अपने सब साथियों सहित rani lakshmi bai की सेना में भर्ती हो गया। महारानी लक्ष्मी बाई ने कुंवर की पदवी उसी दिन खुदा बख्श को भी प्रदान की यह डाकू यथार्थ में कुंवर सागर सिंह बन गया। rani lakshmi bai

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Freedom Fighters In Hindi Essay रोहतक में बम का कारखाना

Freedom Fighters of India क्रांतिकारियों का रोहतक में बम का कारखाना क्रांतिकारियों की बलिदान गाथा

जिस समय क्रांतिकारी वीरों ने अंग्रेज सरकार की नाक में दम कर रखा था और चारों तरफ गिरफ्तारीओं की धूम थी और अंग्रेजो के शिकारी कुत्ते क्रांतिकारियों की खोज निकालने के लिए सूंघते फिरते थे तो भी क्रांतिकारी वीर अपना सिर हथेली पर रखें अपने उद्देश्य की सफलता के लिए यह शपथ लेकर कार्य में जुट जाते थे कि हम देश सेवा में अपना सब कुछ न्योछावर कर देंगे। तन मन धन हमारा सभी कुछ देश के अर्पण होगा और अपने घर का मोह त्याग कर सिर धड़ की बाजी लगा रहे थे उसी समय की एक छोटी सी घटना आपके सम्मुख रखता हूं। Freedom Fighters of India

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क्रांतिकारी वीरो का त्याग पराकाष्ठा पर था वह सर्व प्रयत्न से ही यह चाहते थे कि हमारा देश स्वतंत्र हो शांति की क्रांति से काम ना चलता देख कर ही उन्होंने अस्त्र-शस्त्र द्वारा क्रांति का रास्ता अपनाया था जगह-जगह इन वीरों ने बम बनाने के कारखाने बनाए। Freedom Fighters Of India

Freedom Fighters of India In Hindi Essay

क्रांतिकारी वीर भगवती प्रसाद ने दिल्ली में बम बनाने की अपेक्षा अन्य छोटे शहर में बम बनाना अधिक अच्छा समझा क्योंकि वहां से सरकार को शीघ्र पता ना चल सकेगा यह विचार कर आप अपने पुराने परिचित नवयुवक वैद्य लेख राम जी के पास गए जो कि रोहतक में रहते थे इस कार्य में सहयोग देने के लिए वैध जी ने सहर्ष स्वीकृति दे दी। भगवती प्रसाद को अधिक कार्य रहता था अतः उन्होंने यह कार्य वीर यशपाल को सौंप दिया दिल्ली से सब आवश्यक सामान लेकर जसपाल जी रोहतक में वैध लेख राम जी के पास पहुंच गए वैद्य जी ने पहले से ही एक छोटा सा मकान इस कार्य के लिए ले लिया था और सर्वत्र यह प्रसिद्ध करा दिया था कि अब हम पारे इत्यादि के योग से रस भसम इत्यादि कीमती दवाइयां बनाया करेंगे।

Freedom Fighters of India In Hindi

यहां आकर यशपाल बिल्कुल ग्रामीण व्यक्तियों की भांति ही रहने लगा और अपना नाम भी बदल लिया यशपाल ने अपना नाम किसना रख लिया। वैद्य जी की दुकान रोहतक के बीच बाजार में थी यशपाल प्रतिदिन प्रातः काल दुकान खोलता उसकी सफाई इत्यादि करता था और खाठ बिछाकर खरल लेकर दवाइयां घोटना प्रारंभ कर देता था और इमाम दस्ते में दवाइयां भी कूटता था। इस प्रकार कुछ दिन यही करम चलता रहा गर्मी का समय था वैद्य जी के पास सब काम करने वाला यही किसना ही था रोगियों की सेवा व आतिथ्य भी यही करता पंखा भी गर्मियों में प्राय यही चलाता था।

1857 Freedom Fighters In Hindi Language

इस प्रकार कार्य करते करते कुछ दिन बाद बम बनाने का कार्य प्रारंभ कर दिया बम बनाने के लिए एक तेजाब में शनै शनै दूसरी तेजाब मिलाते समय साथ साथ हीलाना भी पड़ता था। इसी प्रकार तीसरी तेजाब मिलानी पड़ती थी इनके मिलाते समय उनमें से पीले रंग का धुआं निकलता था बर्तन को छोड़ना भी हानिकारक था क्योंकि मिलाते समय चलाना आवश्यक था तेजाब के धुए ने यशपाल जी के तमाम वस्त्र ऐसे कर दिए कि जहां से पकड़ो वहीं से फट जाए। यह हाल हालत देख यशपाल लंगोट बांधने लगा और बाहर आने जाने के अन्य पुराने से वस्त्र रखने लगा कपड़ा ना पहने के कारण अब शरीर पर से तेजाब के प्रभाव से झुरी उतरने लगी परंतु कष्ट कोई विशेष नहीं होता था तेजाब के धुएं के कारण यशपाल को प्राय: खांसी, सिरदर्द, होता ही रहता था किंतु वह परवा ना करता था तेजाब के बर्तन आदि के साफ करने के कारण यशपाल के हाथ काटते थे और लाल लाल हो जाया करते थे रबर के दस्तानो का प्रयोग करने पर भी हाथों पर असर हो जाता था।

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वह प्रतिदिन प्रातः बम बनाने के मसाले का एक घान पकाने के लिए चढ़ा देता था इसे पकाने में 4 घंटे लग जाते थे पुन्हा इसे ठंडा करने के लिए 4 घंटे रखना पड़ता था इस समय में यशपाल दुकान पर जाकर दवाई कूटता पंखा चलाता किसी के आ जाने पर कुए से ताजा पानी लाता था 1 दिन वैद्य जी के किसी मित्र ने इसके हाथों में लाली देखकर पूछा तेरे हाथ लाल क्यों है यशपाल ने बड़ी दिनता पूर्वक उत्तर दिया सरकार जरा मेहंदी लगा ली थी। Freedom Fighters of India

‘’तब लेख राम जी कहने लगे देखो साले जनखे को औरतों कि भांति मेहंदी लगाता है’’

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यशपाल आगंतुकों के लिए पानी आर्य समाज के कुएं से लाता था वहां एक स्वामी जी रहते थे उनसे भी इसका संपर्क हो गया स्वामी जी भी कभी-कभी उससे जलादि मंगवाया करते थे इस प्रकार अनेक कष्ट सहता हुआ भी यह वीर कार्य में दृढ़ संकल्प लगा रहता था। freedom fighters in hindi essay

सांयकाल जब लेख राम जी घर जाते तो कुछ सामान कनस्तर ट्रंक या बोरी ब्यादि यशपाल के सिर पर रख कर ले जाया करते थे एक दिन इसी प्रकार वेध जी और यशपाल जा रहे थे तो रास्ते में वैध जी के एक मित्र मिल गए जो शोड़ा लेमन पी रहे थे। उसने वैद्य जी को भी एक शीशी देदी वैद्य जी ने यशपाल की और घुर कर पूछा क्यों बे किसना तू भी पिएगा सोडा? उसने उत्तर दिया पी लूंगा महाराज। freedom fighters in hindi essay

ऐ हैं? सोडा पिएगा ? बड़ा शौकीन है? साले कभी तेरे बाप ने भी पिया है सोडा? यह कहकर वैद्य जी ने 1 सीसी उसे दे दी वह सड़क पर ही कनस्तर रख कर खड़ा ही खड़ा सोडा पीने लगा तब वैध जी बोले देखो तो बैल की भांति खड़ा डकार रहा है बैठकर क्यों नहीं पीता तब उसे सड़क पर ही बैठ जाना पड़ा।

इतना ही नहीं उसको यदि कभी अखबार भी देखना होता तो छुपकर एकांत में पढ़ना पड़ता था क्योंकि रहस्य को छुपा कर रखना भी जरूरी था किसी को पता भी ना चले कि है पढ़ना भी जानता है इसलिए एकांत में पढ़ता था। एक बार वैद्य जी के एक मित्र ने इस अखबार पढ़ते देख लिया और कहा हरे कृष्णा तू पढ़ना भी जानता है? तब यशपाल ने कहा नहीं सरकार यूं ही मिथ्या किसी तस्वीर को दिखा कर मैं तो यह महात्मा गांधी की मूर्ति देख रहा था। वैध लेख राम यशपाल के खाने-पीने इत्यादि का विशेष प्रबंध करते रहते थे और उसे सब प्रकार की सुविधाएं देने का ध्यान रखते थे।

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बम बनाने का काम प्राय: समाप्त हो गया था। 1 दिन सांयकाल को शहर की पुलिस शहर में कुछ खोज कर रही थी तो लक्ष्मण दास जी ने जो उस समय कांग्रेस कमेटी के सेक्रेटरी थे वेद लेखराज जी को बताया कि पुलिस शहर में घूम रही है यह सुन कर वह जीता था यशपाल जी घबराए सोचा कहीं हमारा तो पता पुलिस को नहीं लग गया उसी रात को ग्रामीण भेष धारण करके यह दोनों उस मसाले को गठरी बांध कर दिल्ली चले गए। Freedom Fighters of India

Freedom Fighters of India

इस प्रकार रोहतक में भी इन क्रांतिकारी वीरों ने बम बनाने का स्थान बनाया और बम बनाए इन्हीं बमों का प्रयोग इन वीरों ने वायसराय को मारने के लिए उसकी स्पेशल रेल के नीचे दबाकर भी किया था। Freedom Fighters of India

देश की स्वतंत्रता के लिए इन वीरों ने कितने कष्ट सहे इसकी हम कल्पना भी नहीं कर पाते उन्हें आजादी के प्रधानों के अमर बलिदान का फल है जो आज हम स्वतंत्रता के आनंद में फूले नहीं समाते और सब राज्य का लाभ प्राप्त कर रहे हैं। उन्हीं वीरों ने इस स्वराज्य रूपी वृक्ष को अपने रक्त रूपी जल से सीच कर बड़ा किया था इतिहास में उन वीरों का नाम सदा के लिए अमर रहेगा। Freedom Fighters of India

मूल लेखक – स्वामी ओमानंद जी

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