Category Archives: Bharat Ka Itihas In Hindi

Ashfaqulla Khan देशभक्त अशफाक उल्ला खान


Ashfaqulla Khan अशफाक उल्ला खान का जीवन हमें बहुत कुछ सीखा जाता है खासतौर से आज के मुस्लिम युवाओं को इन से काफी प्रेरणा लेनी चाहिए यदि मुस्लिम युवा की सोच Ashfaqulla Khan अशफाक उल्ला खान जैसी हो जाए तो इस देश का कोई भी राजनेता इस देश में दंगे नहीं करवा सकता आज जो मुस्लिम युवा भारत माता की जय बोलने से कतराते हैं वंदे मातरम बोलने से कतराते हैं उन्हें एक बार अशफ़ाकउल्ला को जरूर पढ़ना चाहिए।


Ashfaqulla Khan का जन्म शाहजहांपुर में हुआ था Ashfaqulla Khan का खानदान वहां के प्रसिद्ध रईसों में से था यह बचपन से ही खेलकूद कुश्ती आदि में बहुत रुचि रखते थे इनका शरीर लंबा चौड़ा था चेहरे पर रोब था तैरना घोड़े की सवारी तथा शिकार आदि खेलने में यह पारंगत थे। Ashfaqulla Khan जन्म से मुसलमान थे परंतु आप मुसलमान और हिंदुओं में कोई भेद नहीं समझते थे सबको यही कहा करते थे कि हम सब एक ही परमेश्वर के पुत्र हैं फिर हिंदू मुसलमान में भेद क्या है यह Ashfaqulla Khan ने अपने आचरण से भी स्पष्ट कर दिखलाया था।

आप बचपन में कविता सुंदर बनाते थे तथा गाया करते थे बचपन में आप देश के अंदर अत्याचारों को देखकर बहुत ही सोच विचार किया करते थे इन्हीं विचारों के कारण आपके मन के अंदर क्रांति की भावना उत्पन्न हुई आप क्रांतिकारी दल के सदस्य बन गए उस समय मैनपुरी षड्यंत्र में शाहजहांपुर के निवासी राम प्रसाद बिस्मिल के वारंट हो गए। इस बात को सुनकर आप बहुत प्रसन्न हुए कि मेरे विचारों वाला एक व्यक्ति शाहजहांपुर में है उससे मिलने के लिए आपने बहुत प्रयत्न किए किंतु वारंट होने के कारण उससे ना मिल सके जब उनके वारंट समाप्त हो गए तब उनसे मिलने के लिए गए पहले रामप्रसाद जी ने मिलने से मना कर दिया परंतु उनके आग्रह को देखकर इन्हें अपना साथी बना लिया ब्रह्मचारी राम प्रसाद बिस्मिल जी के साथ रहने के कारण आपके संबंधी कहा करते थे कि “तू काफिर हो गया है” इसका यह किंचित मात्र भी विचार नहीं करते थे।

Ashfaqulla Khan के सामने आर्य समाज मंदिर तथा मस्जिद

Ashfaqulla Khan के सामने आर्य समाज मंदिर तथा मस्जिद एक समान थे। शाहजाहा पुर में एक बार हिंदू तथा मुसलमानों का झगड़ा हो गया सारे शहर में मारपीट शुरू हो गई उस समय में आप Ram Prasad Bismil बिस्मिल जी से आर्य समाज मंदिर में बात कर रहे थे कुछ मुसलमान मंदिर के पास आ गए और आक्रमण करने के लिए तैयार हो गए।
Ashfaqulla Khan ने अपना पिस्तौल लिया और आर्य समाज मंदिर के सामने आकर मुसलमानों से कहने लगे कि मैं कट्टर मुसलमान हूं परंतु इस मंदिर की मुझे एक एक ईंट प्राणों से प्यारी है मेरे सामने मंदिर मस्जिद एक समान है यदि किसी ने दृष्टिपात किया तो गोली का निशाना बनाना पड़ेगा यदि तुमको लड़ना है तो दूर जाकर लड़ो उनकी इस सिंह गर्जना को सुनकर सब मुसलमानों के होश गुम हो गए।

Ashfaqulla Khan तथा Ram Prasad Bismil मित्रता


Ashfaqulla Khan तथा Ram Prasad Bismil दोनों में गुड मित्रता थी एक दूसरे को प्राणों से प्यारी समझते थे । 1 दिन की बात है कि Ashfaqulla Khan जी को दौरा पड गया उस समय “राम, राम, राम,” कह रहे थे घर वाले ना समझ पाए कि राम क्या है? उसी समय एक ने कहा राम, राम प्रसाद बिस्मिल है यह दोनों आपस में राम कृष्ण कहते थे बिस्मिल जी आए तब कहा आ गए राम इतने में दौरा समाप्त हो गया।


Ashfaqulla Khan काकोरी षड्यंत्र kakori train robbery

काकोरी षड्यंत्र Kakori Train Robbery में आप शामिल थे जब रेल रोकी गई तब आपको तथा आजाद को यह काम सौंपा गया कि कोई मनुष्य रेल से नहीं उतरे यदि कोई उतरे तो गोली से मार दिया जाए रेल से तिजोरी निकाली गई परंतु किसी से उसका ताला नहीं टूटा फिर आपने आकर उसका ताला तोड़ा उस षड्यंत्र में बहुत व्यक्तियों के वारंट हो गए और साथ साथ आपके भी वारंट हुए इससे आप फरार हो गए।

उस समय अशफाक उल्ला खान को बहुतों ने कहा कि आप दूसरे देशों में चले जाएं किंतु अशफाक उल्ला खान ने उत्तर दिया काम तो मेरा यहां है मैं दूसरे देशों में जा कर क्या करूंगा अंत में 8 दिसंबर 1926 में दिल्ली में पकड़े गए गिरफ्तार करके लखनऊ में लाए गए अदालत में पहुंचने पर स्पेशल मैजिस्ट्रेट सैयद अईनुदिन ने पूछा आपने मुझे कभी पहले देखा है अशफाक उल्ला खान ने कहा मैं तो आपको बहुत दिनों से देख रहा हूं जब से Kakori Kand काकोरी षड्यंत्र का मुकदमा आप की अदालत में चल रहा था तब से मैं आपको कई बार देख चुका हूं जब पूछा कि मैं कहां बैठता था उत्तर दिया साधारण मनुष्य के बीच राजपूत वेश में बैठा करते थे।

1 दिन सुपरिटेंडेंट खान साहब ने कहा देखो अशफाक तुम मुसलमान और हम भी मुसलमान हैं हमें तुम्हारी गिरफ्तारी से बहुत दुख है Ram Prasad Bismil आदि हिंदू हैं इनका उद्देश्य हिंदू राज्य स्थापना करना है तुम पढ़े-लिखे खानदानी मुसलमान हो तुम कैसे इन काफिरों के चक्कर में आगए। ये सुनते ही अशफाक जी की आंखें लाल हो गई और तीव्र स्वर से कहा बहुत हुआ खबरदार ऐसी बात फिर कभी ना खिएगा असल में रामप्रसाद जी आदि सच्चे हिंदुस्तानी हैं और आप जैसा कहते हैं अगर यह सत्य है तो भी मैं अंग्रेजी राज्य से हिंदू राज्य अधिक पसंद करता हूं आपने जो रामप्रसाद जी को काफिर कहा है उसके लिए मैं आपको इस शर्त पर छोड़ता हूं कि आप मेरे सामने से चले जाएं सुपरिटेंडेंट साहब नीचा मुंह करके चले गए।

अदालत में दर्शक और कर्मचारी आपका निर्भीकता पूर्ण व्यवहार देख कर दंग रह गए फांसी का तख्ता सिर पर झूल रहा था परंतु उन्हें कुछ भी प्रवा ना थी अंत में फैसला सुनाया गया इन पर पांच अभियोग लगे थे तीन में फांसी और 2 में काला पानी सजा हुई थी अदालत में आपको बिस्मिल का लेफ्टिनेंट कहा गया था।

इसके बाद अपील की किंतु सभी प्रयत्न व्यर्थ सिद्ध हुए और फांसी देना निश्चित हो गया।

फांसी की बात सुनकर आप को किंचित मात्र भी दुख अनुभव ना हुआ आप मुकदमा समाप्त होते ही फैजाबाद जेल में भेज दिए गए वहां पर कुछ साथी आपसे मिलने के लिए आए तब आप कुछ दुर्बल हो गए थे आपके मित्रों ने देख कर आश्चर्य किया तब आप ने उत्तर दिया कि आप समझते होंगे काल कोठरियों ने मुझे दुबला कर दिया परंतु बात ऐसी नहीं है मैं आजकल बहुत कम खाता हूं और ईश्वर की भक्ति करता हूं कम खाने से परमेश्वर की भक्ति में ज्यादा ध्यान लगता है।

फांसी से 1 दिन पहले कुछ साथी उनसे मिलने आए उसी दिन उनको पुराने कपड़े मिले थे उन्हें धोकर पहने तथा पैरों में जूता पहना उबटन लगाकर स्नान किया बाल कुछ लंबे थे उनको साफ करके फिर प्रसंता के साथ मित्रों से मिलने के लिए गए मित्रों से कहा आज मेरी शादी है दूसरे दिन प्रातः 6:00 बजे फांसी होनी थी।


Ashfaqulla Khanफांसी से 1 दिन पहले उन्होंने एक पत्र देशवासियों को लिखा था वह इस प्रकार है।

भारत माता के रंगमंच का अपना पार्ट आफ हम अदा कर चुके हैं हमने गलत या सही जो कुछ किया वह स्वतंत्रता प्राप्ति की भावना से किया हमारे इस काम की कोई निंदा करेंगे और कुछ प्रशंसा करेंगे क्रांतिकारी बड़े वीर होते हैं वे सदा अपने देश के लिए भला ही सोचते हैं मनुष्य कहते हैं कि हम देश को भयत्रस्त करते है किंतु यह बात गलत है इतने लंबे समय तक मुकदमा चला परंतु हमने किसी एक गवाह तक को ड्रा या नहीं ना किसी मुखबीर को गोली मारी हम चाहते तो किसी खुफिया पुलिस के अधिकारी या अन्य किसी आदमी को मार सकते थे किंतु यह हमारा उद्देश्य नहीं था हम तो कन्हाई लाल दत्त खुदीराम बोस गोपीमोहन शाह आदि की स्मृति में फांसी पर चढ़ जाना चाहते थे।

भारतवासी भाइयों आप कोई हो चाहे जिस धर्म या संप्रदाय के अनुयाई हो परंतु आप देश हित के कामों में एक होकर ही योग दीजिए आप लोग व्यर्थ में झगड़ रहे हैं सब धर्म एक हैं रास्ते चाहे भिन्न-भिन्न हो परंतु लक्ष्य सबका एक है फिर झगड़ा बखेड़ा क्या हम मरने वाले काकोरी अभियुक्तों के लिए आप लोग एक हो जाइए और सब मिलकर नौकरशाही का मुकाबला कीजिए यह सोच कर कि 7 करोड मुसलमान भारत में सबसे पहला मुसलमान मैं हूं जो भारत की स्वतंत्रता के लिए फांसी पर चढ़ा रहा हूं मन ही मन में अभिमान का अनुभव कर रहा हूं किंतु मैं यह विश्वास दिलाता हूं कि मैं हत्यारा नहीं जैसा कि मुझे साबित किया गया है।

ऐसा कहकर 6:00 बजे प्रातः काल अशफाक उल्ला खां फांसी पर चढ़कर परलोक सिधार गए फांसी के बाद उनके संबंधी शव को प्राप्त करना चाहते थे पहले तो निषेध कर दिया किंतु अधिक कहने पर उनका शव रिश्तेदारों को दे दिया गया शाहजहांपुर ले जाते समय जब लखनऊ पहुंचा तब कुछ मनुष्यों ने उनके दर्शन किए उनका कहना है कि फांसी के 10 घंटे बाद में उनके चेहरे पर रौनक थी तथा आंखों के नीचे कुछ पीलापन था।

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प्रोफेसर राममूर्ति की जीवनी कलयुग का भीम Part1

प्रोफेसर राममूर्ति नायडू जी को कलयुग का भीम भी कहा जाता है राममूर्ति नायडू जी में इतना अधिक बल था कि हाथी को भी अपनी छाती पर रोक लिया करते थे आज तक ऐसी ताकत का प्रदर्शन दुनिया में कोई नहीं कर पाया है क्योंकि प्रोफेसर राममूर्ति जी ब्रह्माचार्य का पालन करते थे और प्राणायाम में भी बहुत अधिक निपुण थे और व्यायाम बिल्कुल पुरानी पद्धति से करते थे जैसे कि हमारे ऋषि-मुनियों ने बताया है उन्होंने खोज निकाला था उस व्यायाम कि पद्धति को जिससे उनके अंदर इतना अधिक बल आगया था। indian hercules

दोस्तों यह लेख थोड़ा सा लंबा हो सकता है लेकिन यह लेख आप पूरा पढ़ना इसके बाद में आपको प्रोफेसर राममूर्ति नायडू जी के बारे में संपूर्ण जानकारी मिल जाएगी और यदि आप व्यायाम करते हैं तो और भी अधिक जरूरी है आप इस लेख को पढ़ें।

आर्य समाज के विद्वान ब्रह्मचारी सन्यासी स्वामी ओमानंद जी ने जो कि खुद भी ब्रह्मचारी थे उन्होंने प्रोफेसर राममूर्ति जी के विषय में काफी महत्वपूर्ण लेख लिखा है प्रोफेसर राममूर्ति जी ने खुद जो अपने जीवन के बारे में लिखा था वहीं उन्होंने अपनी पुस्तक में बताया है।

प्रोफेसर राम मूर्ति का जन्म अप्रैल 1882 में हुआ था । राममूर्ति जी लिखते हैं 5 वर्ष की आयु में मुझे दमे के लक्षण दिखाई दिए पिताजी की आज्ञा से मैंने व्यायाम करना आरंभ कर दिया जिसके कारण मेरा रोग दूर हो गया मेरे सम्मुख भीमसेन हनुमान जैसे वीरों की मूर्तियां और चित्र सदैव रहते थे मैं निरंतर यही सोचा करता था कि इनके समान नहीं हो सकता तो अपने शरीर को बलवान तो अवश्य बना सकता हूं। 10 वर्ष की आयु में स्थानीय कालिजियेट स्कूल के अखाड़े में भर्ती हो गया। उन्हीं दिनों पहलवानों की कुश्ती की खबर सुनकर मेरे मन में भी उत्साह उत्पन्न हो गया मैं पहलवान बनने की इच्छा से व्यायाम करने लगा। जो जो रुचि बढ़ती गई त्यों त्यों व्यायामों का अपना अभ्यास बढ़ाता गया। मैंने बड़े उत्साह से सेंडो का डम्बल घुमाना शुरू किया। परंतु 2 वर्ष बाद ही उसे हताश होकर छोड़ दिया। इसका मुख्य कारण यह था कि उससे मुझे विशेष लाभ नहीं प्राप्त हुआ।

प्रारंभ की आयु में मैंने हारिजेंटलबार, पैरेललबार, रिंग आदि विदेशी ढंग की कसरते की। कुछ दिनों के पश्चात इन्हें भी छोड़ दिया और देसी व्यायाम करने लगा। जितने देसी प्रसिद्ध पहलवान मिलते गए उन सब से मैंने शारीरिक शक्ति बढ़ाने की भारतीय प्रथा और उपाय पूछे। परंतु कोई संतोष प्रद विधि ना बता सका। इस समय तक मैंने इंट्रेंस क्लास तक अंग्रेजी और थोड़ी संस्कृत पढ़ ली थी।

संस्कृत के पठन-पाठन में मुझे विशेष आनंद आया शारीरिक उन्नति के साथ-साथ अपने आर्य धर्म के शास्त्र मूल संस्कृत भाषा में पढ़ें। गीता के साथ-साथ सुश्रुत आदि आयुर्वेदिक ग्रंथ भी देखे। अपने शास्त्र के अध्ययन में मुझे शारीरिक उन्नति का सर्वोत्तम उपाय सुझाई पड़ा।अतः समस्त विदेशी ढंग छोड़ कर यही ग्रहण किया और घोषणा कर दी कि भीम, हनुमान, अर्जुन, आदि पूर्वजों के गौरव को बढ़ाने वाली यही सर्वश्रेष्ठ व्यायाम की प्रणाली है। इस देसी व्यायाम में सामान और औजार आवश्यक नहीं धन का कुछ भी व्य नहीं बस अभ्यास ही सब कुछ है जिससे शरीर के पुट्ठे मजबूत होते हैं पुठो की दृढ़ता के लिए प्राणायाम की आवश्यकता है मैं प्रतिदिन 3:00 से 6:00 बजे तक प्राणायाम करता था।12 मील बिना विश्राम पैदल चलता था इसके अतिरिक्त प्रतिदिन एक घंटा जल में तैरता था।

प्रोफेसर राममूर्ति नायडू

प्रोफेसर मूर्ति जी एक अन्य स्थान पर लिखते हैं-

आरंभ आरंभ में व्यायाम करने में शरीर अकड़ने लगता था बहुत बार में आधा व्यायाम करके छोड़ देता अखाड़े में आना दूभर ज्ञात पड़ता। किंतु तुरंत ही मेरे मन के देवता जाग पड़ते अपने आदर्शों को सिद्ध करने की मैंने प्रतिज्ञा कर ली थी यदि ऐसा ना कर सकूं तो मृत्यु अच्छी अंत में दुर्बलता पर मुझे विजय मिली धीरे-धीरे व्यायाम बढ़ने लगा उस समय मेरे व्यायाम का ऐसा करम था भोर ही उठकर घर से 3 कोस तक दौड़ता एक फौजी खड़ा था वहां जाकर खूब कुश्ती लड़ता था लड़कर फिर 3 कोस दौड़ता हुआ घर आता यहां अपने चेलों के साथ कुश्ती लड़ता उस समय अखाड़े में डेढ़ सौ जवान थे उनसे कुश्ती करने के पश्चात विश्राम कर मैं तैरने चला जाता।

फिर सांझ को 15 सौ से लेकर 3000 तक दंड और 5000 से लेकर 10000 तक बैठक कर लेता यही मेरा दैनिक व्यायाम था। इसका फल यह हुआ कि 16 वर्ष की आयु में मुझ में इतनी शक्ति हो गई कि नारियल के पेड़ पर जोर से धक्का मारता तो दो-तीन नारियल टूटकर भद भदा गिर पड़ते। इसी व्यायाम के कारण आज मेरी छाती 45 इंच चौड़ी है और फुलाने पर 57 इंच हो जाती है शरीर की लंबाई 5 फुट 6:30 इंच और तोल अढाई मन है।

प्रोफेसर राममूर्ति Rammurthy Naidu के बल के विषय में उस समय का एक लेखक लिखता है।

आज भारत के घर घर में राम मूर्ति का नाम फैला है वह कलयुगी भीम है हाथी को अपनी छाती पर चढ़ा लेते हैं। 25 घोड़ों की शक्ति की दो दो मोटर रोक लेते हैं छाती पर बड़ी सी चट्टान रखकर उस पर पत्थर को टुकड़े-टुकड़े करवा देते हैं आधे इंच मोटे लोहे की जंजीर कमल की डंडी के समान सहज में ही तोड़ देते हैं। 50 मनुष्यों से लदी हुई गाड़ी को शरीर पर से उतरवा देते हैं। यही नहीं 75 मील की तेजी से दौड़ती हुई हवा गाड़ी उनके शरीर पर से पार हो जाती है यह अलौकिक बल है देवी शक्ति है सुनकर आश्चर्य होता है देखकर दांतो तले उंगली दबाने पड़ती है किंतु यह सब बातें देखने में असाध्य प्रतीत होने पर भी असंभव नहीं है यदि प्रयत्न करें तो प्रत्येक मनुष्य राम मूर्ति के समान हो सकता है प्रयत्न भी हो और सच्ची लगन भी हो।

यह पहले ही लिखा जा चुका है कि राम मूर्ति बाल्य काल में श्वास रोग के रोगी थे वह अपनी देह की निर्बलता पर बड़े दुखी रहते थे भीम, लक्ष्मण, हनुमान आदि वीर योद्धाओं की कथा सुनकर उनके मन में सच्ची लगन उत्पन्न हुई। उन्होंने व्यायाम को अपने जीवन का अंग बनाया वे ब्रह्मचर्य के कट्टर समर्थक थे शारीरिक और मानसिक पवित्रता को ब्रह्मचर्य की नीव समझते थे। ब्रहाचार्य की धुन में ही उन्होंने 44 से 45 वर्ष की आयु तक विवाह नहीं किया भारत के बालकों और युवकों के लिए उन्होंने ब्रहाचार्य और प्राणायाम का क्रियात्मक प्रचार किया उनका स्वभाव बड़ा हंसमुख था वह हंसी को स्वास्थ्य के लिए बड़ा उपयोगी समझते थे।

प्रोफेसर राममूर्ति Rammurthy Naidu सदैव कहा करते थे-

मन से वचन से और तन से पवित्र रहो सादा भोजन करो जीवन सरल रखो प्रतिदिन व्यायाम करो यही संसार में सुखी रहने का मूल मंत्र है।

वह नव युवकों को सदैव इस प्रकार उत्साहित किया करते थे निष्फलता ! निष्फलता ! निष्फलता !!! क्या है? हमने नहीं जाना। एक बार दो बार तीन बार 5 बार 10 बार पर्यतन करते चलो सफलता अवश्य मिलेगी ‘’Do Or Die’’ करो या मरो करूंगा या मरूंगा यही हमारा मूल मंत्र है।

प्रोफेसर राममूर्ति भारत माता के होनहार बालकों की दुर्दशा देखकर उनके उद्धार के लिए व्याकुल होकर कहा करते थे-

भारत के बालकों और युवकों का उद्धार यही मेरे जीवन का मूल सूत्र है वह चाहे कृष्ण और लक्ष्मण भीम और भीष्म या हनुमान के समान हो या ना हो किंतु देश में युवकों की एक अजय सेना तैयार हो यह मेरी मनोकामना है। देश के कोने-कोने में घूमकर मैंने युवकों को प्रोत्साहन दिया है मन, वचन, तन और धन से भारत के नव युवको का मैं सेवक बना हूं 1 दिन में संसार से उठ जाऊंगा किंतु उसके पहले मैं यह आश्वासन चाहता हूं कि मेरी सेवा भारत माता के चरणों में स्वीकृत हुई है।

व्यायाम के विषय में फांसी के तख्ते पर हंसते-हंसते झूलने वाले ब्रह्मचारी रामप्रसाद जी लिखते हैं।

सब व्यायामों में दंड बैठक सर्वोत्तम है जहां जी चाहा व्यायाम कर लिया यदि हो सके तो प्रोफेसर राम मूर्ति की विधि से दंड तथा बैठक करें प्रोफेसर जी की रीति विद्यार्थियों के लिए बड़ी लाभदायक है थोड़े समय में ही पर्याप्त परिश्रम हो जाता है दंड बैठक के अतिरिक्त शीर्षासन और पद्मासन का भी अभ्यास करना चाहिए और अपने रहने के स्थान में वीरों महात्माओं के चित्र रखने चाहिए। Rammurthy Naidu

ब्रह्मचारी रामप्रसाद जी प्रोफेसर राममूर्ति की पद्धति से प्रतिदिन नियम पूर्वक व्यायाम करते थे इससे उनको कितना आश्चर्यजनक लाभ हुआ इस विषय में भी अपनी आत्मकथा में लिखते हैं

व्यायाम आदि करने के कारण मेरा शरीर बड़ा संगठित हो गया था और रंग निखर आया था मेरा स्वास्थ्य दर्शनीय हो गया सब लोग मेरे स्वास्थ्य को आश्चर्य की दृष्टि से देखा करते।

व्यायाम का महत्व

ब्रह्मचारी रामप्रसाद जी के विषय में एक स्थान पर लिखा है

उनमें असाधारण शारीरिक बल था तैरने आदि में वे पूरे पंडित थे थकान किसे कहते हैं वह जानते ही ना थे 60, 61 मील निरंतर चलकर वह आगे चलने का साहस रखते थे व्यायाम और प्राणायाम वह इतना करते थे कि देखने वाले आश्चर्यचकित होते थे।

प्रोफेसर राममूर्ति नायडू

आखिर में मैं आपको बताता हूं प्रोफेसर राममूर्ति जी की मृत्यु कैसे हुई देखिए प्रोफेसर राममूर्ति जी में बल बहुत अधिक था और वो देश भक्त भी थे उनको साधारण तरीके से मारना आसान नहीं था उनको कोई भी युद्ध में तो मार नहीं सकता था उन्हें छल से ही मारा जा सकता था और कोई कानूनी रूप से वह अपराधी भी नहीं थे कि कानून की सजा उन पर थोपी जाती इसलिए अंग्रेजों ने जब हाथी वाली चाल चली और कुछ ऐसा षड्यंत्र रचा की हाथी के द्वारा हाथी के पैरों से उनकी छाती को पूरी तरीके से कुचलवा दिया गया जिस तकते पर हाथी चढ़ा था वह तख्ता उनकी पसलियों के अंदर घुस गया इस प्रकार षड्यंत्र के द्वारा प्रोफेसर राम मूर्ति की अंग्रेजों ने हत्या कर दी थी। Rammurthy Naidu

अगले लेख में आप जानेंगे प्रोफेसर राममूर्ति ने किस प्रकार वह पद्धति खोज निकाली थी जिस पद्धति से हमारे देश के वीर योद्धा श्री राम कृष्ण भीम अर्जुन आदि महाबली व्यायाम करते थे वह प्राणायाम के साथ में व्यायाम करने की विधि अगले लेख में लिखी जाएगी। नमस्ते ओ३म


Mopla Book Hindi Pdf मोपला अर्थात मुझे इससे क्या veer savarkar books in hindi pdf

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” हिंदू तू कब जागेगा रे ”

मोपला अर्थात मुझे इससे क्या विनायक दामोदर सावरकर

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Mopla Book Hindi Pdf मालाबार का भीषण रक्त पात व हिंदू वीनाओं का मार्मिक उपन्यास आधुनिक युग के महान क्रांतिकारी vinayak damodar savarkar की लेखनी से लिखा मुसलमानों की मनोवृति का यथार्थ जीवन चित्रण।

इस पुस्तक में आप पढ़ेंगे दिन दुखी फूट-फूट कर रोती हुई महिलाएं नीच अधर्मीयों ने अपनी क्रूरता का प्रदर्शन कर जिन की साड़ियां भी फाड़ दी थी ऐसी अर्धनग्न कुमारिया की जिनकी लज्जा का हरण किया गया था अपने पिताओं के समक्ष इस निरलज अवस्था और अर्ध भ्रष्ट और अर्धनग्न स्थिति में रहने पर विवश पुत्रियां जो मरने से भी परे मरने सरी की हो गई थी तथा अपनी पुत्रियों और स्त्रियों के सम्मान और जीवन का अपनी आंखों के समक्ष सर्वनाश होते हुए देखने पर विवश अपने पौरुष को धिक्कारते हुए पिता अपनी छातियों से बालकों को लिपटे हुए स्त्रियां और अपने वृद्ध दादा-दादीयों के हाथ पकड़े हुए बालक यह सभी थरथर कांपते हुए तलवारों से ही बनाए गए उस घेरे में उसी प्रकार रोते और गायों के समान ही डकारते हुए घुसा दिए गए। Mopla Book Hindi Pdf 

इस पुस्तक को जिसने नहीं पढ़ा उसने कुछ नहीं पढ़ा हिंदुओं यदि तुम्हारे खून में उबाल खत्म हो गया है यदि वह ठंडा पड़ गया है यदि तुम सेकुलर होने लगे हो और मुसलमानों को अपना मित्र समझने लगे हो तो एक बार इस पुस्तक को पढ़ लेना यदि तुम्हारे अंदर कहीं जातिगत बीजे लेश मात्र भी शेष है तो एक बार इस पुस्तक को पढ़ लेना तुम अपनी कमजोरी समझ पाओगे हिंदुओं और ।

काफी भाई मुझसे यह पुस्तक मांग रहे थे इसीलिए पुस्तक में पीडीएफ में आप सभी की मदद के लिए डाल रहा हूं चाहे आप हिंदू है या मुसलमान आपको एक बार यह पुस्तक जरूर से जरूर पढ़नी चाहिए।

यदि आप हिंदू है तो इस पुस्तक को पढ़कर पता चलेगा कि आपके पूर्वजों ने जाति के नाम पर अपने आप को कितना खोखला बनाया था और मुसलमानों ने आपके पूर्वजों के साथ में कैसे-कैसे अत्याचार किए थे कितने घिनौने अत्याचार किए थे कैसे उनका नरसंहार किया गया था। Mopla Book Hindi Pdf

और यदि आप मुसलमान है और अपने आप को देशभक्त समझते हैं और सोचते हैं कि मैं तो किसी हिंदू से किसी भी का फिर से कोई नफरत नहीं करता तो यह पुस्तक आपको पढ़नी चाहिए आपको पता चलेगा कि सभी मुसलमान एक जैसे होते हैं जब बात इस्लाम की आती है तो उसके लिए कोई काफ़िर मित्र नहीं रहता है इस पुस्तक में तुम मुसलमानों को अपना आईना नजर आएगा। Mopla Book Hindi Pdf

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महारानी लक्ष्मी बाई की वीरता की छोटी से कहानी

महारानी लक्ष्मी बाई का जन्म 1835 में बनारस में हुआ था। उनके पिता का नाम मोरोपंत तांबे था वे महाराष्ट्र के ब्राह्मण थे लक्ष्मी बाई का जन्म का नाम मनु बाईं था। अंतिम पेशवा के भाई जीवनजी आपा पेशवाई समाप्त होने पर काशी चले आए इनके पास ही मोरोपंत तांबे काशी में रहते थे कुछ समय पश्चात आपा जी का देहांत हो गया तांबे जी विवश हो आपा जी के भाई बाजीराव पेशवा के पास बिठूर चले गए।वही अपना जीवन यापन करने लगे चार 5 वर्ष की आयु में मनु बाई की माता जी की मृत्यु हो गई तांबे जी ही ने मनु बाई का पालन पोषण किया पेशवा भी मनु बाई से विशेष प्रेम करता था मनु बाई पेशवा के दत्तक पुत्र नाना साहब के साथ खेलना लिखना पढ़ना घोड़े पर चढ़ना शिकार खेलना तलवार चलाना आदि सब कार्य सिकती थी। जो कार्य नाना साहब करते उसी का वह भी अनुकरण करती थी नाना साहब से भी शीघ्र सब कार्य में निपुणता प्राप्त कर लेती थी एक दिन नाना साहब को हाथी पर चढ़ता देख मनु बाई भी हाथी पर चढ़ने का आग्रह करने लगी पेशवा ने कहा तेरे भाग्य में हाथी की सवारी कहां है मनु बाई को बात चुभ गई उसने तुरंत उत्तर दिया मेरे भाग्य में एक हाथी नहीं 10 हाथी लिखे हैं वह हीन भावना कभी नहीं रखती थी थोड़े ही समय में वह लिखने पढ़ने के साथ युद्ध विद्या में भी पारंगत और निपुण हो गई। rani lakshmi bai

मनु बाई (rani lakshmi bai) अत्यंत रूपवती थी उसका 8 वर्ष की आयु में ही झांसी के राजा गंगाधर से विवाह हो गया विवाह के समय ही उसका नाम लक्ष्मीबाई रख दिया गया 16 वर्ष की आयु में लक्ष्मी बाई को एक पुत्र उत्पन्न हुआ किंतु वह शीघ्र ही मर गया। जिसके कारण राजा गंगाधर को बड़ा दुख हुआ उसी पुत्र के वियोग से शोक के कारण उनका शरीर दिन-प्रतिदिन दुर्बल होने लगा और इसी दुख और चिंता से ही उनकी मृत्यु हो गई मरने से पूर्व उन्होंने एक पुत्र गोद लिया इस दत्तक पुत्र का नाम दामोदर राव था महारानी लक्ष्मी बाई जी ने अपने पति की अंत्येष्टि क्रिया विधिवत की।

महारानी लक्ष्मी बाई

इस समय महारानी लक्ष्मी बाई की आयु 18 वर्ष की थी। उसे यह अथाह दुख सहना पड़ा पति के वियोग का दुख दूसरा राज्य के प्रबंध का भार उस समय केवल उसकी आशा का केंद्र उसका दतक पुत्र ही था। महारानी लक्ष्मी बाई ने कंपनी सरकार के पास प्रार्थना पत्र भेजा कि सरकार उनके दतक पुत्र को राज्य का उत्तराधिकारी स्वीकार कर ले किंतु सरकार ने कुछ समय तक तो उसका कुछ उत्तर ही नहीं दिया फिर rani lakshmi bai ने दूसरा प्रार्थना पत्र भेजा उसका भी कोई उत्तर न मिला उत्तर ना देने का रहस्य यही था कि अंग्रेजी सरकार rani lakshmi bai के दतक पुत्र को स्वीकार नहीं करना चाहती थी धूर्त लॉर्ड डलहौजी ने रानी को एक आज्ञा पत्र भेजा कि कंपनी सरकार ने झांसी के राज्य को अंग्रेजी राज्य में मिला लिया , लक्ष्मी बाई किला खाली करते।

 

महारानी लक्ष्मी बाई लार्ड का पत्र पाकर बहुत दुखी तथा व्याकुल हो गई उसको जो आघात पहुंचा वह अवर्णनीय है। महारानी लक्ष्मी बाई मूर्छित होकर गिर पड़ी कुछ दिन तो बहुत दुखी रही विवशता में पेंशन स्वीकार करनी पड़ी महारानी लक्ष्मी बाई ने एक सती साध्वी के समान पवित्र जीवन बिताना प्रारंभ किया। प्रातः काल 4:00 बजे उठना, स्नान ध्यान पूजा प्रतिदिन गीता का पाठ आदि श्रद्धा पूर्वक करती थी 8:00 बजे नित्य कर्म से निर्मित हो महल के अंदर ही भ्रमण व्यायाम आदि करती थी इसके पश्चात अपने हाथ से 11 सो राम नाम की आटे की गोलियां बनाकर मछलियों को खिलाती थी।फिर रात के 8:00 बजे तक गीता आदि धर्म शास्त्र को सुनती थी उसके पश्चात भजन भोजन करके ईश्वर का स्मरण करती हुई सो जाती थी यही उसका प्रतिदिन का कार्य था उसके पिता मोरोपंत अन्य घर का काम संभालते थे।

महारानी लक्ष्मी बाई के साथ जो व्यवहार अंग्रेजों ने किया यह सारी जनता को खटकता था लॉर्ड डलहौजी की यह स्वार्थ पूर्ण नीति भी स्वतंत्रता युद्ध का एक कारण बना था मध्य भारत उत्तर भारत के बीच झांसी का राज्य अंग्रेजों के लिए एक महत्वपूर्ण केंद्र था इसे वह कैसे छोड़ सकते थे इस स्थान से सिंधिया तथा अन्य राज्यों को वश में किया जा सकता था इसीलिए दत्तक पुत्र को स्वीकार ना करके झांसी को अपने अधीन करना अंग्रेज अति आवश्यक समझते थे। किंतु इस व्यवहार से जनता में अंग्रेजो के प्रति अत्यंत घिरणा उत्पन्न हो गई महारानी लक्ष्मी बाई भी अवसर की खोज में थी तथा धीरे-धीरे तैयारी में लगी हुई थी । 1857 की क्रांति की अग्नि जब देश में भड़की तो झांसी भी कैसे शांत रह सकती थी क्रांति ने अपना रूप दिखाया।

4 जून 1857 को झांसी में 12 नंबर पलटन के हवलदार गुरबख्श सिंह ने किले के मैगजीन और खजाने पर कब्जा कर लिया इसके पश्चात लक्ष्मी बाई ने महल से निकल के स्वयं शस्त्र धारण कर क्रांतिकारी सेना का सेनापति बनना स्वीकार किया। उस समय लक्ष्मी बाई की आयु 21 वर्ष की थी 7 जून को रिसालदार काले खान तहसीलदार मोहम्मद हुसैन ने किले पर हमला किया किले के अंदर की देसी पलटन भी इनके साथ मिल गई किला भी हाथ में आ गया। रिसालदार काले खान की आज्ञा से 67 अंग्रेज मार दिए गए यह कार्य महारानी की आज्ञा के बिना ही सैनिकों ने कर डाला इतिहास लेखक सर जान के लिखता है कि इस हत्याकांड में महारानी लक्ष्मी बाई का कोई संबंध नहीं था ना उसका कोई आदमी मौके पर था ना उसने इसकी आज्ञा ही दी थी अंत में उसी दिन झांसी से कंपनी का राज्य हटा दिया गया बालक दामोदर के संरक्षक के रूप में रानी लक्ष्मी बाई झांसी की गद्दी पर बैठे कंपनी का झंडा उतार दिया गया सम्राट का हरा झंडा झांसी पर फहराने लगा सारे राज्य में स्वतंत्रता की घोषणा कर दी गई।

महारानी लक्ष्मी बाई rani lakshmi bai

गुलाम गौस खां को मुख्य तोपची बनाया गया उसने रानी को सलामी की तोपे दागदी तोपों की मरम्मत की गई नयी तोपे ढलने लगी बारूद बनने लगे भाऊ बक्शी को तोपे ढालने का कार्य सौंपा गया । लक्ष्मणराव प्रधानमंत्री नियुक्त हुआ प्रधान सेनापति दीवान जवाहर सिंह को बनाया गया पैदल सेना के तीन कर्नल मोहम्मद जमाल खान दीवान रघुनाथ सिंह और खुदा बख्श नियुक्त हुए। घुड़सवारों की मुख्य सेनापति स्वयं महारानी जी बनी और कर्नल सुंदर, मुंदर और काशीबाई बनाई गई। यह तीनों रानी की सहेलियां थी। न्यायाधीश नाना भोटकर बनाए गए और मोरोपंत कमठाने के प्रधान गुप्तचर विभाग मोती बाई के हाथ में दिया गया

नायाब जूही को बनाया गया सारे विभागों को सौंपकर सुप्रबंद कर दिया गया। झांसी में सब कार्य सुव्यवस्थित रूप से चलने लगा झांसी का राज्य लेने पर अंग्रेजों ने सब पुरानी तोपों में किल्ली ठोक कर उन्हें बेकार कर दिया था उन्हें ठीक करने का कार्य तुरंत चालू किया पुरानी तोपें ठीक कर दी गई गुलाम गौस ने कुछ तोपें भूमि में गड़ी हुई पड़ी थी उनको भी संभाल लिया।

महारानी लक्ष्मी बाई rani lakshmi bai

गोले गोलियां बनाने का तलवार बंदूक पिस्तौल आदि तैयार करने का कार्य भी चालू कर दिया गया नए हथियार बनाने में कुछ समय लगता इसलिए जहां मिले पुराने हथियार इकट्ठे किए गए जनता ने जी खोलकर रुपया दिया 13 जून की रात को महारानी लक्ष्मी बाई को गुप्त चर मोतीबाई ने सूचना दी सदाशिवराव जो झांसी गद्दी का दावेदार था उसने कुछ सेना इकट्ठी कर ली है वह कटेरा में था झांसी को वह अनाथ समझता था उसने दो 1 दिन के भीतर ही अपना अभिषेक करवा लिया और अपने आप को झांसी का महाराजा कहने लगा इधर महारानी ने भी शीघ्र ही तैयारी कर बड़े वेग से अपने घुड़सवारों को लेकर कटेरा को जा घेरा। बड़ी कठिनाई से वह जान बचाकर भाग गया उसने सिंधिया के राज्य में नरवर में जाकर शरण ली।

सिंधिया ने कुछ सेना से उसकी सहायता की किंतु महारानी लक्ष्मी बाई ने उसे नरवर में घेर कर पकड़ लिया और कैदी बनाकर झांसी के दुर्ग में बंद कर दिया सुंदर और काशी बाई ने इस युद्ध में अच्छी वीरता दिखाई इसी प्रकार उन दिनों कहीं डकैती भी हो जाती थी महारानी के सूपरबन्ध  के कारण सर्वत्र राज्य में शांति थी किंतु कुंवर सागर सिंह नाम का डाकू झांसी के राज्य में कहीं डाका डाल चुका था उस प्रांत का थानेदार उस डाकू को नहीं पकड़ सका महारानी लक्ष्मी बाई की आज्ञा से खुदा बख्श 25 सैनिक घुड़सवार लेकर बरवासागर में उस डाकू को पकड़ने के लिए गया उसने उस डाकू सागर को उसके गांव में अपने मकान में ही घेर लिया दोनों ओर से गोलियां चली मकान के अंदर छत पर चढ़कर खुदा बख्श मकान के अंदर सिपाहियों सहित कूदा किंतु सागर सिंह ने खुदा बख्श को तलवार से जख्मी करके भाग गया यह सूचना महारानी को झांसी में मिली रानी अपनी सहेलियों सहित 25 घुड़सवार साथ लेकर स्वयं डाकू को ठीक करने के लिए चली वर्षा अधिक होने से बेतवा नदी में भयंकर बाढ़ आई थी। नाव नहीं लग सकती थी आंधी चल रही थी रानी ने सबको कूदने की आज्ञा दी बहुत साहास का कार्य था। ईश्वर कृपा से सब नदी पार की।

बरवासागर पहुंचकर आराम किया । पता लगा के डाकू जंगल में है उसको महारानी लक्ष्मी बाई ने जंगल में जा घेरा और एक टोली ने सागर सिंह का गांव रावली जा घेरा डाकू एक गुफा में भोजन कर रहे थे उन पर अकस्मात आक्रमण हुआ वह हड़बड़ा गए खाना पीना छोड़ घोड़ों की नंगी पीठ पर बैठ कर दून की निकास की ओर भागे तीन और से बंदूक चल रही थी किंतु डाकुओं का एक व्यक्ति भी घायल नहीं हुआ निकास के द्वार पर तीनों सहेलियों और मोती बाई सहित महारानी लक्ष्मी बाई तैयार खड़ी थी जब डाकू उधर भागे तो उधर से पांच बन्दूक चली घोड़े मरे डाकू घायल हुए डाकुओं ने भी बन्दूक चलाई रानी का दल आड़ में था अतः कोई प्रभाव नहीं हुआ डाकू सिर पर पैर रखकर भागे काशी सुंदर और मोती बाई ने प्रथक प्रथक पीछा किया रानी और सुंदर बाई के हाथ में नंगी तलवार और गले में सोने का आभूषण था।

कुछ पीछे घोड़े पर सवार एक डाकू निकला महारानी लक्ष्मी बाई समझ गई यही सागर सिंह है दोनों ने उसका पीछा किया दोनों सपाटे से उस पर टूट पड़ी किंतु सागर सिंह बचाव करता हुआ आगे बढ़ा भूमि नरम कीचड़ वाली आ गई सागर सिंह का घोड़ा अटकने लगा rani lakshmi bai और सुंदर बाई के घोड़े काठियावाड़ी और बड़े प्रबल थे सागर सिंह को एक और रानी ने दूसरी ओर से सुंदर बाई ने दबाया सागर सिंह rani lakshmi bai को पहचान गया उसने rani lakshmi bai पर आत्मरक्षा के भाव से वार किया तुरंत सुंदर बाई ने चप्पल गति से तलवार डाकू पर उठाई वार ओ ओछा पड़ा घोड़े की पीठ पर। उधर रानी ने घोड़े को रोक वह कुछ अंगुल पीछे हुई सागर सिंह का वार उनसे आगे खींच गया । rani lakshmi bai ने अपनी तलवार का वार ऐसा कसा की सागर सिंह की तलवार के दो टुकड़े हो गए डाकू के घोड़े की पीठ कट चुकी थी वह तेज ना दौड़ सका सुंदर बाई तलवार का वार करना चाहती थी rani lakshmi bai ने रोक दिया और कहा जीवित पकड़ना है rani lakshmi bai ने आगे बढ़कर सागर सिंह की कमर में हाथ डाला सुंदर भाई समझ गई क्या करना है सुंदर ने दूसरी ओर से अपना हाथ डाल दिया और झटका देकर घोड़े की पीठ से उठा लिया सागर सिंह ने खिसकने का यतन किया किंतु वज्रपात में फंसा था विफल रहा।

दांतो से काटना चाहता था कि महारानी लक्ष्मी बाई ने कहा यदि मुंह खोला तो तलवार ठूंस दूंगी थोड़ी देर में दल के और व्यक्ति भी मिल गए सागर सिंह रस्सियों से बांध दिया गया। बरवासागर पहुंचने तथा विश्राम करने पर डाकू से पूछताछ की डाकू ने बताया वह ठाकुर है अंग्रेजों की अधीनता स्वीकार ना करके डाकू बना है उन्होंने स्त्रियों और दरिद्रो को कभी ना सताया डाकू ने प्रार्थना कि मुझे फांसी ना देकर गोली या तलवार से प्राण दंड दिया जाए। rani lakshmi bai ने पूछा कि यदि तुम को छोड़ दूं तो क्या करोगे उसने कहा कि डाके डालूंगा किंतु आपके राज्य में नहीं अथवा श्री चरणों की नौकरी करके लड़ाई में पराक्रम दिखाऊंगा महारानी लक्ष्मी बाई ने उसे क्षमा प्रदान की डाकू ने गंगा की शपथ खाकर डाके का कार्य छोड़ दिया और अपने सब साथियों सहित rani lakshmi bai की सेना में भर्ती हो गया। महारानी लक्ष्मी बाई ने कुंवर की पदवी उसी दिन खुदा बख्श को भी प्रदान की यह डाकू यथार्थ में कुंवर सागर सिंह बन गया। rani lakshmi bai

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Freedom Fighters In Hindi Essay रोहतक में बम का कारखाना

Freedom Fighters of India क्रांतिकारियों का रोहतक में बम का कारखाना क्रांतिकारियों की बलिदान गाथा

जिस समय क्रांतिकारी वीरों ने अंग्रेज सरकार की नाक में दम कर रखा था और चारों तरफ गिरफ्तारीओं की धूम थी और अंग्रेजो के शिकारी कुत्ते क्रांतिकारियों की खोज निकालने के लिए सूंघते फिरते थे तो भी क्रांतिकारी वीर अपना सिर हथेली पर रखें अपने उद्देश्य की सफलता के लिए यह शपथ लेकर कार्य में जुट जाते थे कि हम देश सेवा में अपना सब कुछ न्योछावर कर देंगे। तन मन धन हमारा सभी कुछ देश के अर्पण होगा और अपने घर का मोह त्याग कर सिर धड़ की बाजी लगा रहे थे उसी समय की एक छोटी सी घटना आपके सम्मुख रखता हूं। Freedom Fighters of India

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क्रांतिकारी वीरो का त्याग पराकाष्ठा पर था वह सर्व प्रयत्न से ही यह चाहते थे कि हमारा देश स्वतंत्र हो शांति की क्रांति से काम ना चलता देख कर ही उन्होंने अस्त्र-शस्त्र द्वारा क्रांति का रास्ता अपनाया था जगह-जगह इन वीरों ने बम बनाने के कारखाने बनाए। Freedom Fighters Of India

Freedom Fighters of India In Hindi Essay

क्रांतिकारी वीर भगवती प्रसाद ने दिल्ली में बम बनाने की अपेक्षा अन्य छोटे शहर में बम बनाना अधिक अच्छा समझा क्योंकि वहां से सरकार को शीघ्र पता ना चल सकेगा यह विचार कर आप अपने पुराने परिचित नवयुवक वैद्य लेख राम जी के पास गए जो कि रोहतक में रहते थे इस कार्य में सहयोग देने के लिए वैध जी ने सहर्ष स्वीकृति दे दी। भगवती प्रसाद को अधिक कार्य रहता था अतः उन्होंने यह कार्य वीर यशपाल को सौंप दिया दिल्ली से सब आवश्यक सामान लेकर जसपाल जी रोहतक में वैध लेख राम जी के पास पहुंच गए वैद्य जी ने पहले से ही एक छोटा सा मकान इस कार्य के लिए ले लिया था और सर्वत्र यह प्रसिद्ध करा दिया था कि अब हम पारे इत्यादि के योग से रस भसम इत्यादि कीमती दवाइयां बनाया करेंगे।

Freedom Fighters of India In Hindi

यहां आकर यशपाल बिल्कुल ग्रामीण व्यक्तियों की भांति ही रहने लगा और अपना नाम भी बदल लिया यशपाल ने अपना नाम किसना रख लिया। वैद्य जी की दुकान रोहतक के बीच बाजार में थी यशपाल प्रतिदिन प्रातः काल दुकान खोलता उसकी सफाई इत्यादि करता था और खाठ बिछाकर खरल लेकर दवाइयां घोटना प्रारंभ कर देता था और इमाम दस्ते में दवाइयां भी कूटता था। इस प्रकार कुछ दिन यही करम चलता रहा गर्मी का समय था वैद्य जी के पास सब काम करने वाला यही किसना ही था रोगियों की सेवा व आतिथ्य भी यही करता पंखा भी गर्मियों में प्राय यही चलाता था।

1857 Freedom Fighters In Hindi Language

इस प्रकार कार्य करते करते कुछ दिन बाद बम बनाने का कार्य प्रारंभ कर दिया बम बनाने के लिए एक तेजाब में शनै शनै दूसरी तेजाब मिलाते समय साथ साथ हीलाना भी पड़ता था। इसी प्रकार तीसरी तेजाब मिलानी पड़ती थी इनके मिलाते समय उनमें से पीले रंग का धुआं निकलता था बर्तन को छोड़ना भी हानिकारक था क्योंकि मिलाते समय चलाना आवश्यक था तेजाब के धुए ने यशपाल जी के तमाम वस्त्र ऐसे कर दिए कि जहां से पकड़ो वहीं से फट जाए। यह हाल हालत देख यशपाल लंगोट बांधने लगा और बाहर आने जाने के अन्य पुराने से वस्त्र रखने लगा कपड़ा ना पहने के कारण अब शरीर पर से तेजाब के प्रभाव से झुरी उतरने लगी परंतु कष्ट कोई विशेष नहीं होता था तेजाब के धुएं के कारण यशपाल को प्राय: खांसी, सिरदर्द, होता ही रहता था किंतु वह परवा ना करता था तेजाब के बर्तन आदि के साफ करने के कारण यशपाल के हाथ काटते थे और लाल लाल हो जाया करते थे रबर के दस्तानो का प्रयोग करने पर भी हाथों पर असर हो जाता था।

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सुखदेव जी के बारे में यह बातें नहीं जानते होंगे आप

वह प्रतिदिन प्रातः बम बनाने के मसाले का एक घान पकाने के लिए चढ़ा देता था इसे पकाने में 4 घंटे लग जाते थे पुन्हा इसे ठंडा करने के लिए 4 घंटे रखना पड़ता था इस समय में यशपाल दुकान पर जाकर दवाई कूटता पंखा चलाता किसी के आ जाने पर कुए से ताजा पानी लाता था 1 दिन वैद्य जी के किसी मित्र ने इसके हाथों में लाली देखकर पूछा तेरे हाथ लाल क्यों है यशपाल ने बड़ी दिनता पूर्वक उत्तर दिया सरकार जरा मेहंदी लगा ली थी। Freedom Fighters of India

‘’तब लेख राम जी कहने लगे देखो साले जनखे को औरतों कि भांति मेहंदी लगाता है’’

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यशपाल आगंतुकों के लिए पानी आर्य समाज के कुएं से लाता था वहां एक स्वामी जी रहते थे उनसे भी इसका संपर्क हो गया स्वामी जी भी कभी-कभी उससे जलादि मंगवाया करते थे इस प्रकार अनेक कष्ट सहता हुआ भी यह वीर कार्य में दृढ़ संकल्प लगा रहता था। freedom fighters in hindi essay

सांयकाल जब लेख राम जी घर जाते तो कुछ सामान कनस्तर ट्रंक या बोरी ब्यादि यशपाल के सिर पर रख कर ले जाया करते थे एक दिन इसी प्रकार वेध जी और यशपाल जा रहे थे तो रास्ते में वैध जी के एक मित्र मिल गए जो शोड़ा लेमन पी रहे थे। उसने वैद्य जी को भी एक शीशी देदी वैद्य जी ने यशपाल की और घुर कर पूछा क्यों बे किसना तू भी पिएगा सोडा? उसने उत्तर दिया पी लूंगा महाराज। freedom fighters in hindi essay

ऐ हैं? सोडा पिएगा ? बड़ा शौकीन है? साले कभी तेरे बाप ने भी पिया है सोडा? यह कहकर वैद्य जी ने 1 सीसी उसे दे दी वह सड़क पर ही कनस्तर रख कर खड़ा ही खड़ा सोडा पीने लगा तब वैध जी बोले देखो तो बैल की भांति खड़ा डकार रहा है बैठकर क्यों नहीं पीता तब उसे सड़क पर ही बैठ जाना पड़ा।

इतना ही नहीं उसको यदि कभी अखबार भी देखना होता तो छुपकर एकांत में पढ़ना पड़ता था क्योंकि रहस्य को छुपा कर रखना भी जरूरी था किसी को पता भी ना चले कि है पढ़ना भी जानता है इसलिए एकांत में पढ़ता था। एक बार वैद्य जी के एक मित्र ने इस अखबार पढ़ते देख लिया और कहा हरे कृष्णा तू पढ़ना भी जानता है? तब यशपाल ने कहा नहीं सरकार यूं ही मिथ्या किसी तस्वीर को दिखा कर मैं तो यह महात्मा गांधी की मूर्ति देख रहा था। वैध लेख राम यशपाल के खाने-पीने इत्यादि का विशेष प्रबंध करते रहते थे और उसे सब प्रकार की सुविधाएं देने का ध्यान रखते थे।

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बम बनाने का काम प्राय: समाप्त हो गया था। 1 दिन सांयकाल को शहर की पुलिस शहर में कुछ खोज कर रही थी तो लक्ष्मण दास जी ने जो उस समय कांग्रेस कमेटी के सेक्रेटरी थे वेद लेखराज जी को बताया कि पुलिस शहर में घूम रही है यह सुन कर वह जीता था यशपाल जी घबराए सोचा कहीं हमारा तो पता पुलिस को नहीं लग गया उसी रात को ग्रामीण भेष धारण करके यह दोनों उस मसाले को गठरी बांध कर दिल्ली चले गए। Freedom Fighters of India

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इस प्रकार रोहतक में भी इन क्रांतिकारी वीरों ने बम बनाने का स्थान बनाया और बम बनाए इन्हीं बमों का प्रयोग इन वीरों ने वायसराय को मारने के लिए उसकी स्पेशल रेल के नीचे दबाकर भी किया था। Freedom Fighters of India

देश की स्वतंत्रता के लिए इन वीरों ने कितने कष्ट सहे इसकी हम कल्पना भी नहीं कर पाते उन्हें आजादी के प्रधानों के अमर बलिदान का फल है जो आज हम स्वतंत्रता के आनंद में फूले नहीं समाते और सब राज्य का लाभ प्राप्त कर रहे हैं। उन्हीं वीरों ने इस स्वराज्य रूपी वृक्ष को अपने रक्त रूपी जल से सीच कर बड़ा किया था इतिहास में उन वीरों का नाम सदा के लिए अमर रहेगा। Freedom Fighters of India

मूल लेखक – स्वामी ओमानंद जी

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Sukhdev सुखदेव जी के बारे में यह बातें नहीं जानते होंगे आप

सरदार भगत सिंह के साथ फांसी पर लटकाए जाने वाले अनंतम साथी श्री Sukhdev Thapar सुखदेव लायलपुर पंजाब के रहने वाले थे। श्री Sukhdev जी का जन्म 15 मई 1907 को दिन के 10:45 बजे हुआ था। आपके पिता का देहांत आपके जन्म से 3 वर्ष पहले हो चुका था इसलिए आप की सेवा और शिक्षा का प्रबंध आपके चाचा अचिंत राम ने किया था।

सुखदेव की माताजी जब जब कहती थी कि सुखदेव मैं तुम्हारी शादी करूंगी तो घोड़ी पर चढ़ेगा तब सुखदेव सदा यही उत्तर देते थे घोड़ी पर चढ़ने के बदले फांसी पर चढ़ूंगा।

Sukhdev Thapar In Hindi

जब Sukhdev की 5 वर्ष की आयु थी तो उनको धनपतमल आर्य हाई स्कूल में दाखिला दिलवाया गया। स्कूल में सुखदेव ने सातवीं श्रेणी तक शिक्षा प्राप्त की। इसके पश्चात लायलपुर सनातन धर्म स्कूल में भेजे गए और सन 1922 में इस स्कूल से आप ने द्वितीय श्रेणी में 10 की परीक्षा पास की। सुखदेव की बुद्धि बहुत ही तीव्र थी। Sukhdev किसी भी परीक्षा में अनुत्तीर्ण नहीं हुए। उनका स्वभाव शांत और कोमल था सुखदेव की बुद्धि तर्क करने में बहुत चलती थी। सुखदेव का जन्म आर्य समाजी घर में होने के कारण उन पर आर्य समाज का विशेष प्रभाव पड़ा। जहां भी आर्य समाज का सत्संग होता था वहां पर आप अवश्य जाते थे और आप को हवन संध्या योगाभ्यास का भी शौक था।

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सन 1919 में पंजाब के अनेक शहरों में मार्शल लॉ जारी था उस समय आप की आयु 12 वर्ष की थी और सातवीं श्रेणी में पढ़ते थे। आपके चाचा इसी मार्शल ला में गिरफ्तार कर लिए गए बालक Sukhdev पर इस घटना का विशेष प्रभाव पड़ा सुखदेव के चाचा अचिंत राम का कहना था कि जब मैं जेल में था तब सुखदेव मुझसे मिलने आता था। तब पूछता था कि चाचा जी क्या इस जेल में आपको कष्ट दिया जाता है और कहता था कि मैं तो किसी को भी नमस्ते तक नहीं करूंगा।

उसी समय एक दिन सारे शहर की पाठ शालाओं के विद्यार्थियों को एकत्रित करके यूनियन जैक ब्रिटिश झंडे का अभिवादन कराया गया था परंतु सुखदेव इसमें सम्मिलित नहीं हुए और चाचा के जेल से आते ही बड़े गर्व से कहा कि मैं झंडे का अभिवादन करने नहीं गया।

सन 1921 में महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन प्रारंभ किया तो सारे भारत में जागृति की लहर फैल गई सुखदेव के जीवन में एक बार बड़ा भारी परिवर्तन हुआ आपके ऊंचे विचार होते हुए भी आपको कीमती कपड़े बहुत अच्छे लगते थे परंतु आंदोलन प्रारंभ होते ही आपने विलायती ढंग के कपड़ों का सदा के लिए परित्याग कर दिया और खद्दर के कपड़े पहनने लगे इसके साथ हिंदी भाषा पढ़नी प्रारंभ कर दी और अपने साथियों में भी हिंदी भाषा का प्रचार करते थे आप का कहना था कि देश के उत्थान के लिए राष्ट्र भाषा की आवश्यकता है और उसकी पूर्ति हिंदी भाषा ही कर सकती है।

इस असहयोग आंदोलन ने सुखदेव के जीवन को बदल डालो उधर माता विवाह करना चाहती थी परंतु चाचा जी विरुद्ध क्योंकि वे आर्य थे अतः आर्य सिद्धांत के अनुसार विवाह करना चाहते थे सुखदेव की माताजी जब जब कहती थी कि सुखदेव मैं तुम्हारी शादी करूंगी तो घोड़ी पर चढ़ेगा तब सुखदेव सदा यही उत्तर देते थे घोड़ी पर चढ़ने के बदले फांसी पर चढ़ूंगा। ऐसा ही हुआ सुखदेव ने देश को आजाद करवाने के लिए अपने जीवन का बलिदान दे दिया और भगत सिंह, राजगुरु सुखदेव, को अंग्रेजों ने देश को आजाद करवाने के अपराध में फांसी पर चढ़ा दिया।

Essay On Sukhdev

सन 1922 में जब सुखदेव ने एंट्रेंस की परीक्षा पास कर ली तब आपके चाचा ने जेल से आगे की उच्च शिक्षा पाने के लिए लाहौर डीएवी कॉलेज में प्रवेश हो जाना को काहा परंतु सुखदेव ने चाचा की आज्ञा का पालन ना करके नेशनल कॉलेज में नाम लिखवा लिया यहां पर ही आपका परिचय सरदार भगत सिंह आदि से हुआ था आप की मंडली में 5 सदस्य थे और परस्पर बहुत प्रेम था विद्यालय के छात्र आपको पंच पांडव के नाम से पुकारते थे।

श्री सुखदेव और सहपाठियों को पर्वत यात्रा का बहुत ही शौक था सन 1920 के ग्रीष्मकालीन अवकाश में कांगड़ा की पहाड़ियों पर भ्रमण करने गए इस यात्रा में यशपाल भी सम्मिलित था वापस आने के समय इस पार्टी को दिनभर में 42 मील की यात्रा करनी पड़ी।

अंग्रेजो के द्वारा भारतीयों को ईसाई बनाने की आकांक्षा

Rishi Dayanand को एक वेश्या ने अपने जाल में फ़साना चाहा

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साइमन कमीशन के आने पर इन पंच पांडवों ने निश्चय किया कि समारोह पूर्वक प्रदर्शन करना चाहिए समारोह के लिए झंडिया बना रहे थे इस समय केदारनाथ भी थे परंतु उन्हें नींद आ गई तो वे सो गए उधर सुखदेव जी सरदार भगत सिंह के घर सो रहे थे भगत सिंह ने भी कहा कि मैं भी सोता हूं परंतु मित्रों ने ना सोने दिया उसी समय भगत सिंह के अंदर विचार आया कि यदि पुलिस हमारे घर पर घेरा डालेगी तो सुखदेव पकड़ा जाएगा इसलिए सुखदेव को सावधान करने के लिए एक मित्र को भेजा उसने थोड़े से समय में आकर कहा कि भगत सिंह के घर पर पुलिस पहुंच गई है।

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पुलिस ने श्री Sukhdev को पकड़ लिया और बहुत प्रसन्न किए परंतु उन्होंने किसी प्रश्न का भी उत्तर नहीं दिया आपको 12 घंटे जेल में रखा गया इसके पश्चात कुछ लोगों ने जाकर आपको छुड़वा दिया उसके पश्चात कुछ लोगों में पार्टी बनाने का विचार हुआ तो भगत सिंह और सुखदेव नया प्रस्ताव रखा कि नव युवकों को राजनीतिक शिक्षा देनी चाहिए सरदार भगत सिंह ने प्रचार का कार्य प्रारंभ किया इन के पश्चात श्री सुखदेव को सौंपा गया आप इस प्रचार कार्य को बहुत दिनों तक बड़ी सफलता के साथ करते रहे आप का सिद्धांत था कि मैं केवल कार्य करना चाहता हूं प्रशंसा नहीं।

इसके पश्चात 15 अप्रैल सन 1929 को श्री किशोरी लाल और प्रेम नाथ के साथ आप की भी गिरफ्तारी हो गई। अंत में 7 अक्टूबर सन 1930 को फांसी का दंड सुनाया और 13 मार्च सन 1931 को 24 वर्ष की आयु में आप को फांसी पर लटका दिया गया आप अपना नाम अमर कर गए और बलिदान इयों में लिखवा गए।

दोस्तों देश तो आजाद हो गया लेकिन यह देश आज भी मानसिक रूप से गुलाम है यहां का युवा आज भी विदेशियों को ही सब कुछ समझता है वह भूल गया है कि कभी युवाओं ने ही बलिदान देकर इस देश को आजाद करवाया था और अपने प्राणों का बलिदान दे दिया था सिर्फ इसलिए आने वाली नस्लें शायद उनके बलिदान से कुछ सीखें और इस देश के लिए कुछ करें लेकिन अफसोस होता है आज के युवाओं को देख कर जो कि नशे में डूबते जा रहे हैं अश्लील चीजों में डूबते जा रहे हैं भोग विलास अपना अमूल्य समय बर्बाद कर रहे हैं।

मैं इस लेख के माध्यम से युवाओं से सिर्फ इतना ही कहना चाहूंगा कि अपने अंदर देशभक्ति की भावना को कूट-कूट कर लीजिए सबसे पहले आपके लिए आपका देस है इस देश को बचाइए आज भी यहां के नेता इसे लूट रहे हैं। इंकलाब जिंदाबाद, वंदे मातरम, भारत माता की जय, जय जननी जय जन्मभूमि।

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अंग्रेजो के द्वारा भारतीयों को ईसाई बनाने की आकांक्षा

1847 से बहुत पहले से ही अनेक कूटनीतिज्ञ अंग्रेजों ने भारत को ईसाई बनाने में ही अपने राज्य की  स्थिरता समझी थी। ईस्ट इंडिया कंपनी के अध्यक्ष मिस्टर मेडल्स ने 1847 में पार्लियामेंट में कहा था। 

‘’ परमात्मा ने हिंदुस्तान का विशाल साम्राज्य इंग्लैंड को सौंपा है इसलिए ताकि हिंदुस्तान के एक सिरे से दूसरे सिरे तक ईसा मसीह का विजय झंडा फहराने लगे हम में से प्रत्येक को अपनी पूरी शक्ति इस कार्य में लगा देनी चाहिए जिससे समस्त हिंदुस्तान को ईसाई बनाने के महान कार्य में देशभर के अंदर कहीं पर भी इसी कारण थोड़ी सी भी ढील ना होने पाए।’’bharat ka itihas in hindi 

 

इसी के समकालीन एक दूसरा अंग्रेज रेवरेंड कैनेडी लिखता है

‘’ हम पर कुछ भी आपत्तियां क्यों ना आए जब तक भारत में हमारा साम्राज्य है तब तक हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारा मुख्य कार्य उस देश में ईसाई मत को फैलाना है जब तक कन्याकुमारी से लेकर हिमालय तक सारा हिंदुस्तान ईशा के मत को ग्रहण ना कर लें और हिंदू तथा मुसलमान धर्मों की निंदा ना करने लगे तब तक हमें निरंतर प्रयत्न करते रहना चाहिए। इस कार्य के लिए हम जितने पर्यतन कर सके हमें करनी चाहिए और हमारे हाथ में जितने अधिकार और जितनी सत्ता है उसका इसी के लिए उपयोग करना चाहिए।  ‘’

 

यही विचार लार्ड मैकाले के लेखों में भी पाए जाते हैं। जिसने भारतीय शिक्षा प्रणाली यानी कि गुरुकुल प्रणाली का सबसे अधिक नाश किया वह देखिए क्या लिखता है। Isai Dharm

‘’ हमें भारत में इस प्रकार की एक श्रेणी पैदा कर देने का भरसक प्रयत्न करना चाहिए जो कि हमारे और उन करोड़ों भारतीयों के बीच जिन पर हम शासन करते हैं समझाने बुझाने का काम करें यह लोग ऐसे होने चाहिए जो कि रक्त और रंग की दृष्टि से हिंदुस्तानी हो किंतु जो अपनी रुचि भाषा भाव और विचारों की दृष्टि से अंग्रेज हो।  ‘’

अंग्रेजों ने अपने राज्य में ईसाइयत का कितना प्रचार किया और वह क्या करना चाहते थे यह ऊपर लिखित उदाहरणों से सर्वथा स्पष्ट हो जाता है। उनका अपना राज्य था भारतीयों की कोई सुनने वाला ना था अतः अंग्रेज अफसरों ने भारतीयों के साथ इच्छा अनुसार अन्याय और अत्याचार पूर्ण व्यवहार किया भारतीयों के धार्मिक भावों पर पद पद पर आघात किया ईसाई पादरियों ने अपनी वक्ताओं और पत्र-पत्रिकाओं में हिंदू तथा मुसलमान धर्म की घोर निंदा की। Isai Dharm

Isai Dharm Isai Dharm

सन 1849 में पंजाब पर कंपनी का अधिकार हो गया था इसके उपरांत कंपनी ने पंजाब को आदर्श ईसाई प्रांत बनाने के पर्यटन की एक सर हेनरी लॉरेंस, सर जॉन लारेंस आदि पंजाब के अंग्रेज शासक इसी विचार के थे इनमें से अनेकों का मत था कि पंजाब में शिक्षा का सब कार्य ईसाई पादरियों के हाथ में दे दिया जाए और सरकार की ओर से स्कूलों को पूरी सहायता दी जाए तथा अंग्रेज सरकार अपने स्कूल बंद करते स्कूल और कालेजों में इंजील और इसाई मत की शिक्षा दी जाया करें। अंग्रेज सरकार हिंदू धर्म और इस्लाम को किसी प्रकार की सहायता ना दे किसी भी प्रकार सरकारी विभाग में हिंदू मुसलमान कर्मचारी को त्योहार की छुट्टी ना दी जाए न्यायालयों में हिंदू मुसलमान धर्म शास्त्रों को और धार्मिक रीति-रिवाजों को कोई स्थान ना दिया जाए हिंदू मुसलमानों के धार्मिक कीर्तन बंद कर दिय जाए। Isai Dharm

अंग्रेजो के द्वारा भारतीयों को ईसाई बनाने की आकांक्षा

धीरे-धीरे इन अत्याचारी शासकों ने सैनिकों के धार्मिक भावुक की भी अवहेलना प्रारंभ कर दी बात बात में उनके धार्मिक नियमों का उल्लंघन किया जाने लगा कारतूस ओं में गाय और सुअर की चर्बी लगाना और फिर उनको मुंह से चुड़वाना इसका क्रियात्मक उदाहरण है कंपनी की सेना के अनेक अंग्रेज अधिकारी स्पष्ट रूप से सैनिकों के धर्म परिवर्तन के कार्य में लग गए। बंगाल की पदार्थ की सेना के एक अंग्रेज कमांडर ने अपनी सरकारी रिपोर्ट में लिखा है कि मैं निरंतर 28 वर्ष भारतीय सैनिकों को ईसाई बनाने की नीति पर आचरण करता रहा हूं और गैर ईसाइयों की आत्मा को शैतान से बचाना मेरे फौजी कर्तव्य का एक अंग रहा है।

 

सैनिकों को पद भर्ती में काफी लोभ दिया गया कि जो भी अपना धर्म छोड़ देगा उसको हवलदार बना दिया जाएगा और हवलदार को सूबेदार तथा सूबेदार को मेजर इत्यादि इसका परिणाम यह हुआ कि भारतीय सिपाहियों में बहुत असंतोष फैल गया भारत वासियों को ईसाई बनाने का पर्यतन सैनिकों को बलात धर्म परिवर्तन इत्यादि कामो से भारतीय जनता के मन असंतोष और प्रतिकार की भावनाओं से भर गए। अत्याचार के प्रतिशोध की भावना से ही 57 की महान क्रांति का जन्म हुआ

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